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Social distancing

Social Media
व अन्य सभी जगह पर  एक शब्द और है जो बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है ओर पिछले 2 महिन से यह शब्द बहुत प्रचलित हो चुका है जिसको हमे समझना चाहिए और इस शब्द का पालन भी करना चाहिए।
Social Distancing
उचित दूरी बनाए रखे
संग दोष से बचाव = किसी के साथ नहीं रहना बाहर वाला आपके संपर्क से दूर और आप भी सभी से उचित दूरी बनाए शारीरिक तथा यहां हम मानसिक विचारो से दूरी बनाए क्युकी स्वयं को मजबूत बनाना है इस समय नकरात्मक विचारो का प्रभाव हम ना पड़े
भीड़ वाले इलाके में ना जाए साथ ही भीड़ एकत्रित ना होने दे
“भीड़ और झुण्ड” यह दोनों शब्द अब बहिष्कृत हो जाएंगे
“भेड़ चाल” यह शब्द गायब होगा अगले कुछ समय में
एकला चलो
असंग
स्वयं के साथ ज्यादा समय व्यतीत करना।
Self Quarantine  =

किसी को छूना नहीं ,किसी का स्पर्श नहीं लेना घर के सदस्यों से भी उचित दूरी बनाए रखना

अब यह एक शब्द है स्वयं को एक कमरे के भीतर ही रखना और आत्ममंथन करना  यदि आप चिड़चिड़ा या भीड़ के साथ नहीं रहना तो खुद एक अलग बंद कमरे में रह सकते हो और स्वयं के लिए बहुत कुछ सोच सकते , जिसे आप आत्म उत्थान कह सकते है इसी एक चीज के लोग घर छोड़ दिया करते थे परन्तु प्रकृति ने ये संदेश दिया है कि स्वयं के साथ रहे और स्वयं का निर्माण करे
सेल्फ ग्रूम = self Grooming

Home Quarantine = खुद को घर में कैद कर लेना और कहीं बाहर नहीं जाना यह भी एक अच्छा विचार है दुनिया की भीड़ से बिल्कुल अलग हो जाना और स्वयं के चित को शांत करना अपने परिवार के साथ खूब सारी बाते करना और बतियाना ना फोन की जरूरत ना किसी ओर चीज की आवश्यकता गृहस्थ जीवन ही अति सुखदाई अपने परिवार संग अपने समय का लाभ उठाओ और परिवार जन सहित अपने जीवन को सार्थक करो।

बेइंतहा मोहब्बत

जख्म

गिला-शिकवा ,
दर्द ए सितम,
ना मरहम कोई उन्होंने लगाया
बस
वक़्त बेवक्त
जख्म को नासूर बनाया
क्या क्या ना उन्होंने – क्या क्या ना उन्होंने
मुझ पर आजमाया
देखो तो सही अरे देखो तो सही
कमाल उनका था ये
उन्होंने हथियार भी ना उठाया
ओर
खून खंजर बिन मेरा कर दिया
और अब उन पर
इस जुल्म इल्जाम भी नहीं आया।

Patience

धीर , धीरज , सब्र, धैर्य, यह चारो शब्द इस एक patience शब्द में बदल दिए गए है
क्या आपको नहीं लगता?  कि हमारे शब्द कहीं खो गए है हमारे हिंदी भाषा के शब्दों का हनन हो रहा है
अंग्रेजी भाषी होना ठीक है परन्तु उचित स्थान पर ही सही है जहां जरूरत हो बिना जरूरत के अंग्रेजी भाषा ठीक नहीं है क्युकी अंग्रेज़ी में शब्दों का हनन होता है।
अब उन चारो शब्दों में कितना प्रेम है परन्तु patience
एक शब्द जिसमे ये चार शब्द आ गए क्या उसमे प्रेम दिखता है ? क्या भावनाए पता चल रही है ? क्या वो शब्दों का एहसास , अनुभव मालूम पड़ रहा है
मेरे ख्याल से बिल्कुल भी नहीं
यदि आप आजकल रामायण देख रहे है तो उसमें हिंदी के शब्दों का इतनी सहजता से प्रयोग हो रहा है जो मन को हर्षित कर देता है ऐसी हिंदी पिछले 20 साल में किसी और धारावाहिक में नहीं दिखी।

क्यों अंग्रेज़ी भाषा पर इतना बल दिया जा रहा है ? क्यों हिंदी में अधिक से अधिक कार्य नहीं कराए जाते ?
ऐसा क्या है अंग्रेज़ी में? ठीक है हम मान भी लें अंग्रेज़ी अतिआवश्यक है आज के समय के अनुसार परन्तु हिंदी अत्यंत आवश्यक भाषा है जो पूरी तरह से वैज्ञानिक है हर एक स्वर , उच्चारण की स्तिथि अलग स्थान से निकलती है जो सीधे आपके शरीर और मस्तिष्क को प्रभावित करती है और सभ्य शालीनता प्रदान करती है

तथा आपके भीतर जो विकार है उन्हें बाहर निकालती है परन्तु अंग्रेज़ी भाषा आपके भीतर विकार पैदा करती है। अंग्रेज़ी भाषा में बहुत सारे ऐसे शब्द है जो अर्थ का अनर्थ कर देते है परन्तु हिंदी हर एक शब्द को सही अर्थ एवं ज्ञान की दृष्टि से प्रमाणित करती है।

हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है और कोई भी अक्षर वैसा क्यूँ है उसके पीछे कुछ कारण है , अंग्रेजी या किसी अन्य  भाषा में ये बात देखने में नहीं मिलती।

क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय ध्वनि कंठ से निकलती है। एक बार बोल कर देखिये।
च, छ, ज, झ,ञ- तालव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ तालू से लगती है। एक बार बोल कर देखिये।
ट, ठ, ड, ढ , ण- मूर्धन्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है। एक बार बोल कर देखिये।
त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय जीभ दांतों से लगती है। एक बार बोल कर देखिये।
प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए, क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के मिलने पर ही होता है। एक बार बोल कर देखिये।


यह सही हे कि हम अपनी भाषा पर गर्व करते हैं  परन्तु लोगो को इसका कारण भी बताईये इतनी वैज्ञानिकता दुनिया की किसी भाषा मे नही है।

हमारा सीधा संबंध इस भौतिक एवम् पार भौतिक सत्ता से जोड़ता है।


रामायण और महाभारत तो आपको वैज्ञानिक दृष्टि भी प्रदान करते है जिसमें आपको सामान्य विज्ञान और एडवांस टेक्नोलॉजी भी दिखती है। हम सभी जितना हिंदी से दूर हो रहे है उतनी ही बुद्धि कुमति की ओर अग्रसर है इस बुड्ढी को सुमति की कारण है तो हमें हमारी हिंदी भाषा , संस्कृत को सुदृढ करना होगा तभी हमारे विचारो में अधिक परिवर्तन दिखेगा
क्या आपने रामायण में भविष्यवाणी सुनी ? जब लक्ष्मण भरत को मार देने के बारे में सोचता है आकाशवाणी का यही संदेश आता है बिना विचारे किसी मत पर पहुंचना बाद में पछतावे का कारण हो सकता है।
यह आकाशवाणी कोई कल्पना मात्र नहीं है यह सत्य है इसी प्रकार से पहले भविष्यवाणी होती थी यही भविष्यवाणी महाभारत में भी देखने को मिलेगी
एक द्वापर युग की कथा है और एक त्रेता युग की परन्तु कलयुग में आकाशवाणी नहीं होती सुनाई से रही है क्युकी हम सभी अपने कोर अपनी आत्मा से दूर होते जा रहे है यही कारण है हमारा जीवन व्यस्त नहीं अस्त- व्यस्त हो रहा है

“Patience”

थोड़ी बेखबरी थी

मेरी जिंदगी में
बस थोड़ी बेखबरी थी
कुछ सहमी
कुछ अकड़ी थी
एक आहट थी
दबे पाँव की सरसराहट थी
तभी मेरी एक बाह ने
दूसरी बाह पकड़ी थी जो
इस कदर जकड़ी थी मानो
लिपटी आग से एक लकड़ी थी
जिसमे मेरी जिंदगी अटकी थी
कोई एक राह सी भटकी थी

मेरी जिंदगी

कुछ ख्याल हम भी करने लगे

कुछ ख्याल हम भी करने लगे है
कुछ सवाल हम भी करने लगे है
जरा ख्याल रखना इन सवालो का
कुछ जवाब अब हम भी देने लगे है
कुछ ख्याल हम भी करने लगे है
कुछ बात हम भी करने लगे है
कुछ मुलाकात हम भी करने लगे है
कुछ ख्याल रखना इन मुलाकातों का
इन मुलाकातों की बात अब हम भी करने लगे है
कुछ ख्याल हम भी करने लगे है
कुछ याद हम भी करने लगे है
कुछ दीदार हम भी करने लगे है
जरा ख्याल रखना तुम अपना, अपनी यादों में दीदार कर  तुम्हारा याद अब हम भी करने लगे है
कुछ ख्याल हम भी करने लगे है
कुछ अश्क़ बहने लगे है
कुछ आह भी हम भरने लगे है
जरा ख्याल रखना अश्क़ों का तुम्हारी याद आने से अश्क़ अब इन्ह आंखों से बहने लगे है।
कुछ ख्याल अब हम भी करने लगे है
के अब मुलाकाते जरूरी है
सब्र है हमे लेकिन इतना
बतादो के अब सब्र के इम्तिहान
से हम भी गुजरने लगे है

कुछ ख्याल हम भी करने लगे है

ब्रह्माण्ड का जुड़ा होना

ब्रह्मांड का जुड़ा होना
ब्रह्मांड का एक दूसरे के साथ जुड़े होना हम सभी साथ है कोई भी अलग नही है ना ही कोई आगे है ना पीछे है बस सब साथ साथ है पूरा ब्रह्मांड एक छोर से दूसरे तक बंधा हुआ है
Ek dusre ke saath
"Interconnected universe"
हम सभी किसी ना किसी रूप में एक दूसरे के साथ जुड़े हुए है किस तरह से ये हमे जानना होगा , हमारा विचारो के साथ हमारे शब्दो के साथ हमारे कार्यो के साथ अब उस जुड़े होने से हम कैसे और बेहतर हो बड़े कैसे हो ?
कैसे हम एक बड़ा विचार बना सकते है जिसमे सभी का सहयोग हो हैम सभी जुड़े हुए है अपने विचारो के कारण अपनी इच्छाओ के कारण हमारी आवश्कताओं के कारण हुअमृ जरूरते एक दूसरे के साथ पूर्णतया जुड़ी है
हमारा जीवन भी विचारो सोच शब्द एहसास के साथ जुड़े हुए है हमारी घटनाएं भी एक साथ जुड़ी हुई है हर एक घटना एक दूसरे से जुड़ी हुई है हिमारी घटना का आसपास होना किसी न किसी रूप में हमे भी प्रभावित करती है
किसी व्यक्ति के द्वारा उच्चारित शब्दों का हमारे ऊपर भी प्रभाव पड़ता है
हम सभी एक दूसरे के शब्दो से भी प्रभावित होते है उसी प्रकार हमारा जीवन एक दूसरे के जीवन में होने वाली घटनाओ से प्रभावित होता है क्योंकि हमारा संबंध किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ है
हमारी सोच विचार एहसास भावनाएं आपस में जुड़ी हुई है जिस प्रकार एक व्यक्ति सिर्फ अपने आप से नही उसकी पहचान बहुत सारी बातो के साथ होती व्यक्ति और व्यक्ति का नाम परिवार , गली मोहल्ला , शहर, देश , आदि से उस व्यक्ति की पहचान होती है

प्रभाव स्वयं का

हमारा स्वयम का कोई अस्तित्व है या नही??
क्यों हम दुसरो की विचारधारा में अपना जीवन व्यतीत कर रहे है ?
क्यों हम किसी दूसरे से इतनी जल्दी प्रभावित हो जाते है ? दुसरो के विचारो से , शब्दो से, कार्यो से
हमारा जीवन प्रभावित हो रहा है लेकिन क्यों ?
यदि कोई हमारे सामने व्यक्ति सो रहा होता है तो हम प्रभावित हो जाते है हमे भी नींद आने लग जाती है हमारे अंदर भी आलस पैदा होने लग जाता है
इसका कारण क्या है ?
क्या हम कमजोर है ?
क्या हमारे अंदर आत्मबल की कमी है अर्थात स्वयं का बल नहीं है ?
क्या हमारा खुद पर कोई नियंत्रण नहीं है ?
क्या हमारे अंदर स्वयम का कोई प्रभाव नही है ?
दुसरो की विचारधारा हमे अपने साथ बहाकर लिए जा रही है दुसरो के शब्द , भावनाए और एहसास हमे अपने साथ बहाकर ले जाते है हम दुसरो के शब्दों से एकदम  प्रभावित हो जाते है क्यों ? क्या आपने यह जानने की कोशिश की है
हमारे विचार आपस मेल करते है तो हम उसको सहमति दे देते है अथवा नहीं और यदि किसी के विचार ज्यादा प्रभावशाली होते है ती भी हम समर्पण भाव दे देते है
  किसी ने कुछ कह दिया और प्रभावित हो गए स्वयम का कोई प्रभाव ही नही
  क्या ??
हमारे अंदर हमारा बहाव दुसरो के कारण हो रहा है दुसरो के विचारो और शब्दों के कारण हमारे जीवन का निर्माण हो रहा है परिस्तिथियां निर्मित हो रही है ।
यह विचार आ रहे है और जा रहे है इसी प्रकार से हमारा जीवन भी चले जा रहे है यदि हमने इन विचारो पर जोर ना दिया , ठीक ढंग से सोच नही और यदि हमने कोई विचार नही किया तो दुसरो की और और समय की विचारधारा हमे भी अपने साथ बहाकर ले जाएगी , हमे सोचना और विचारना होगा तथा उन सभी बातो को सही ढंग से समझना होगा , यदि हम अपने विचारो को अपने जीवन के बहाव को सही ढंग से सही रूप में सही दिशा में नही लेकर जाएंगे तो हमे भी उसी विचारधारा में बहना पड़ेगा और फिर हमारा जीवन हमारा न होगा वो जीवन किसी और के विचारो और शब्दो के कारण निर्मित होगा
क्या आपका जीवन आपके द्वारा नियंत्रित है या किसी और द्वारा ?

आप और आपका भविष्य

आप ही हो अपने भविष्य के निर्माता है इसलिए इसे समझे
बहुत सारे सवाल है जो प्रश्न मेरे मस्तिस्क में आते है,  किस से पूछे हम अपने इन सवाल को ? कौन बताएगा इन सवालो के जवाब ? यह ऐसे सवाल है जिनका उत्तर सिर्फ हम स्वयं ही जान सकते है और कोई आपको नहीं बता सकता
क्या मेरा कोई अंतिम स्थान है?
क्या है मेरी मंजिल ?
मुझे किस ओर जाना है?
मुझे किस मंजिल की तलाश है?
मैं कहाँ से आया हूँ?
और कहाँ जा रहा हूँ ?
मैं अपनी मंजिल तक कैसे पहुँचूँ?
कैसे पहुँचूँगा?
क्या है मेरी मंजिल का साधन ?
मेरे विचार और मेरी खोज किस तरह से मेरी मंजिल तक पहुचने में मेरी मदद कर रही है?
   
बहुत सारे प्रश्नो का अम्बार हमारे इस मस्तिस्क में लगता जा रहा है।

ऐसा लगता है की हमारे पूछे ही सवालो का जवाब नहीं होता हमारे पास
मै बड़ा बेबस सा महसूस करता हूँ जब नहीं मिलता कोई जवाब लेकिन रुकता नहीं थकता नहीं हूँ आगे निकल चलता हूँ क्युकी मुझे ऐसा लगता है एक समय आता है जब सभी सवालों का जवाब सामने आता है जो पूछ रहा हूं आज उन सभी प्रश्नों का समधन कभी तो मिलेगा इसलिए आज सिर्फ मै सवाल पूछ रहा हूं
क्या आप अपने बारे में जानने की इच्छा नही रखते ? क्या नहीं जानना चाहते इस जीवन के बारे में ?
क्यों आप अपनी मंजिल का रास्ता नहीं खोज रहे?
या आप इस रास्ते पर जाना नहीं चाहते ?
मंजिल आपको चुन रही है सही रास्ते
और सही दिशा के लिए
हम कैसे अपनी मंजिल की और पहुच रहे है? कौन सा रास्ता हमने चुन लिया है इस जीवन के लिए ?
क्या मंजिल तक पहुचना आसान है,
क्या मंजिल पास में ही है या बहुत दूर है ?
हम सभी को अपने जीवन के लक्ष्य की दिशा को निर्धारित करनी चाहिए  और आप पाओगे की आप सही मंजिल की ओर जा रहे है।
इस सफ़र का कोई अंत नहीं यह तो अनंत की यात्रा है यह सफ़र है स्वयं को जानने का, जीवन के कार्यो को समझने और उन्ह कार्यो को पूरा करने का , स्वयं का अनुभव पाने का स्वयं का अर्थ जानने का , स्वयं को महतवपूर्ण बनाने का , स्वयं से स्वयं की मंजिल तक पहुचने का
इस छोटे से जीवन में बहुत सारी घटनाओ का समावेश है। आपको अपने जीवनरूपी अर्थ को समझने का, बनाने का पहचानने के लिए यह घटनाये हमारे जीवन को महत्वपूर्ण बनाती है। और और अर्थपूर्ण बनाती है। हमे स्वयं में होने का एहसास दिलाती है। यह सभी घटनाये हमारे जीवन की विकासशील परिकिर्यायो से विकसित होने तक सहायता करती है।
यह सभी घटनाये हमारे जीवन में गति प्रदान करती है तथा हमे मृत्यु का भी बोध कराती है।
हम अपने जीवन बिंदु को किस प्रकार से जान सकते है, समझ सकते है? पहचान सकते है?
किस तरह से हम अपनी मंजिल की और बढ़ रहे है ? ऐसे कौनसे सहायक तत्व है जो हमारे जीवन में हमारी मदद करते है आगे बढ़ने के लिए एक सही दिशा की अवसर होने के लिए उन दिशा निर्देशों को हमें भली प्रकार से समझना चाहिए
यह हमे जानना है समझना तथा इस जीवन को और महतवपूर्ण भी बनाना है
क्या है हमारे इस जीवन का लक्ष्य? 
किन कारणों से हुआ है? 
हमारा जन्म यह भी हमे जानना है

शब्द जो चोटिल करदे

बस ऐसे ही बड़े अच्छे मूड में बैठा हुआ था मैं अपनी दुकान पर मेरी किताबो की दुकान है जिस पर पर बहुत सारे छोटे बच्चे आते है ओर बहुत लडकिया व लड़के जो आते है दुकान है
उस दिन शाम को एक लड़की आई अपनी मम्मी के साथ  जो लगातार आती रहती है मेरी दुकान पर उस दिन उसने मुझसे एक किताब के बारे में पूछा की भैया वो हिंदी की  आरोह , वितान 11वी क्लास की  किताब आयी है क्या ?
मेने जरा रुक कहाँ क्योंकि वह किताबे पहले भी 2 बार वो पूछ चुके थे ओर मेरे पास नही थी तब भी ओर आज फिर मेने कहाँ "नही यार" 
जैसे ही मेने उसे नही यार कहाँ उसने फटाक से उत्तर दिया भैया 'यार' मत बोला करो बहन बोल लिया करो।
(उस समय उसकी मम्मी भी साथ में थी तो यह एक सोचने वाली बात है की उस छोटी लड़की ने यह बात बोली होगी तो मुझे कितना अजीब लगा होगा )
मुझे एकदम से इतना अजीब लगा की मैं बिल्कुल चुप हो गया ओर अब जैसे मेरे पास कुछ शब्द ना थे मेने अपनी गर्दन हिलाकर उसे आरम से कह दिया ठीक है।
बात अगर देखी जाए तो बात तो कुछ भी नही है क्योंकि आजकल हम सभी या ज्यादातर लोग पापा यार, भाई यार , बहन यार , मम्मी यार , कहकर ही बोलते है वैसे भी यह आदत मुझे धीरे धीरे यही से लगी है क्योंकि ज्यादातर बच्चे मुझे भैया यार कहकर ही बोलते है
लेकिन उस दिन मुझे अपने आप से घृणा आ रही थी क्योंकि मेरे मन में उसके लिए कोई ऐसा भाव नही था कोई ग़लत ओर असभ्य भाषा का प्रयोग नहीं करता  जिससे उसको आहत हो या मैं किसी को उन नजरो से नही देखता , या अपशब्द बोलता परंतु उस छोटी लड़की के कहे वो दो शब्द मुझे बहुत चुभ गए जिसका दर्द नही जा रहा है अब मैं पिछले 3 दिनों से किसी बात कर रहा हु तो ऐसे लग रहा है की कोई फिर से मुझे ऐसा कोई  न कहदे , कोई मेरे बारे में गलत ना सोचले क्योंकि वो शब्द मेरे कानो में  बार बार गूंज रहे है।
मुझे डर लगता है ऐसे विचारों से जो मेरे बारे में गलत अवधारणा रख ले बिना मुझे जाने पहचाने।
यह भी ठीक है की मुझे इस प्रकार के शब्द प्रयोग में नही लाने चाहिए क्योंकि मैं उम्र के लिहाज से बड़ा हु यदि मैं ही इन सब शब्दो का प्रयोग करूंगा तो आगे आने वाली पीढ़ी किस तरह की होगी ?


"यार" कभी कभी बात कुछ भी नही होती और शब्द के मायने , मतलब भी कुछ नही होते लेकिन वो भीतर तक चुभ जाते है बार बार यही एहसास दिलाते है कि यह होना था ऐसा कुछ सोच भी ना था। ना ही ऐसा मेरा कहने का तातपर्य था, किसी को आहत करने के लिए भी उस शब्द का प्रयोग नही किया जा रहा था परंतु फिर भी ना जाने वो शब्द कैसे किसी को चोटिल कर देता है जिसकी वजह से आप भी बहुत अजीब , घृणित  महसूस करते हो खुद से,
वो शब्द नासूर बनकर आपको तकलीफ देते है आप इग्नोर करने की भी कोशिश करते हो परंतु यह शब्द है जिनका बार बार प्रयोग होता है और आप बार बार आहित होते हो।

विषय में रुचि सबकी अलग अलग

सबकी अपनी अलग अलग तरह की रूचि होती है और अलग अलग विषयो में परंतु यह जरुरी नहीं है कि हम सभी को जीवन में हमारी रूचि के अनुसार ही कार्य मिले और जिस विषय में हमारी है उसमें हमे सफलता मिले इसलिए हम जो भी कार्य करते है उसे ओर उत्साह से करे यही एक बेहतर विकल्प है बहुत सारे छात्रों की रूचि गणित में होती है परंतु उससे ज्यादा छात्रों को गणित समझ में ही नहीं आती और कुछ छात्र गणित में रूचि तो रखते है परंतु उसमे सफल नहीं हो पाते। बहुत सारे छात्र यह निर्णय लेते है 10वीं कक्षा के बाद #Science के विषय लेंगे परंतु उतने अंक ही नहीं प्राप्त कर पाते की वो विज्ञानं ले पाए या फिर उन्हें ये लगने लगता कि क्या आगे वो कर पाएंगे या नहीं ? क्योंकि जरुरी नहीं है आपको विज्ञानं के सभी विषय पसंद हो 
उसमे #physics #chemistry #biology होती है जरुरी नहीं है आपको यह तीनों विषय पसंद हो समय के साथ साथ आपको अपनी रुचियों के बारे में पता लगता है फिर आप उसी और अग्रसर होते है क्योंकि जरुरी नहीं है जिसमे आपकी रुचि आज है उसीमे आपकी रुचि कल भी हो।
हमारे जीवन में हर पड़ाव पर बहुत सारे ऐसे कार्य सामने आते है  जो हमे अपनी रूचि के अनुसार नहीं मिलते लेकिन हमें वो सभी कार्यो को करना हमारे जीवन की आवश्यकता में आ जाते है चाहे हम उस कार्य को करना चाहते है अथवा नहीं परंतु कार्य तो करना ही होता है क्यों ना  हम उन सभी कार्यो को #उत्साह पूर्वक  करे 
 जिस तरह से हम पुस्तक पढ़ते है अथवा जो बिषय हमारी पसंद का नहीं है फिर भी हमे उस विषय को भी पढ़ना पड़ता है क्योंकि हमें परीक्षा में सफल होना होता है, हम में से ज्यादातर छात्रों को #सामाजिक विज्ञान पढ़ने में अरुचि होती है लेकिन हमें परीक्षा में सफल होने के लिए वो विषय पढ़ना अनिवार्य होता है जबकि सामाजिक विज्ञान ही सबसे महत्वपूर्ण विषय निकल कर बाहर आता है जब आप #IAS #IS आदि की #परीक्षाओ की तैयारी करते है तो सबसे ज्यादा आपको सामाजिक अध्यन आदि के विषयों में ही सबसे अधिक जानकारी लेनी होती है चाहे वो विषय हमे पसंद था या नहीं परंतु जानकारी लेने के लिए उस विषय में हमे रूचि बनानी पढ़ी तथा उत्साह से के साथ पढ़ना भी पढ़ा 


इसलिए सफल व्यक्तित्व के लिए हमे सभी कार्यो को उत्साह के साथ करना चाहिए किसी भी कार्य को करते समय हमको #बोरियत ना महसूस हो पूर्ण #ध्यान और समग्र एकाग्रता के साथ हमे अपने कार्य को लगातार करना चाहिए तथा उस कार्य में जब तक सफलता ना प्राप्त करले तब तक हमे उस कार्य को  करना चाहिए क्योंकि वही कार्य आपको आपकी #मंजिल की और ले जाने में सहायक है 


फिर हमें परीक्षा हेतु के लिए पढ़ने होते है ताकि हम परीक्षा में सफल हो सके यदि हम वही विषय उत्साह से पढ़े तो हम सफल तो होंगे ही अपितु उस #विषय में अच्छे #अंक भी प्राप्त कर पाएंगे
या फिर एक ही काम को बार बार करते हुए हम बोर हो जाते है परंतु वो कार्य करना हमारी मज़बूरी होता है यदि हम वही कार्य रूचि के साथ करे तो हम उस कार्य को अच्छे ढंगसे तथा अच्छे परिणाम की स्तिथि तक करते है