जब दुकानदार खाली बैठा हो , तब उसकी दुकान से ज़्यादा उसका मन खुला रहता है। ग्राहक नहीं होते, आवाज़ें नहीं होतीं, सौदेबाज़ी का शोर नहीं होता—बस एक लंबा सन्नाटा होता है। उसी सन्नाटे में मन के भीतर कई प्रश्न उठने लगते हैं।
आज ग्राहक क्यों नहीं आए?
क्या मेरी दुकान सही जगह पर है?
क्या दाम ज़्यादा हैं या समय बदल गया है?
क्या यह काम आगे भी चलेगा या कुछ और सोचना चाहिए?
जब दुकानदार खाली बैठा होता है, तब उसकी दुकान से ज़्यादा उसका मन खुला रहता है। बाहर से देखने पर लगता है कि वह बस समय काट रहा है, लेकिन भीतर बहुत कुछ चल रहा होता है। ग्राहक नहीं होते, आवाज़ें नहीं होतीं, सौदेबाज़ी का शोर नहीं होता—
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