दुकान के सामने खड़ी उम्र
वो लड़की मेरी दुकान पर लगभग हर रोज़ आती थी।कभी पेन लेने, कभी कॉपी…कभी बस यूँ ही कोई छोटा-सा सामान।उम्र में अभी इतनी छोटी थी किदुनिया उसे खेल समझती,और वह दुनिया को।मैं उसे कभी किसी नज़र से नहीं देखता था।वो मेरी दुकान की नियमित ग्राहक थी—बस इतनी-सी पहचान थी हमारी।कुछ दिनों पहले तकवो हमेशा अकेली आती थी।आँखों में जल्दबाज़ी,हाथों में किताबें,और बातों में एक मासूम-सी सीधाई।फिर अचानकवो अकेली नहीं आने लगी।अब वो दुकान तक आती है,लेकिन दरवाज़े से थोड़ी दूरी परएक लड़का खड़ा रहता है।कभी मोबाइल में खोया,कभी उसकी तरफ़ देखता हुआ।मुझे नहीं पतावो उसका दोस्त हैया कुछ और।मुझे जानना भी नहीं।लेकिन इतना जानता हूँकि ये वही उम्र हैजहाँ ध्यान सबसे जल्दी भटकता है,और नुकसान सबसे देर से समझ आता है।इस उम्र मेंघंटों की बातेंकिताबों से ज़्यादा आसान लगती हैं।भावनाएँ भारी हो जाती हैं,और लक्ष्य हल्के।पढ़ाई चुपचाप पीछे छूटती है।करियर का रास्ता धुँधला हो जाता है।और मन—बिना समझे ही बोझ उठाने लगता है।अब वो मुझसे नज़रें चुराने लगी है।दुकान पर आती है,सामान लेती है,लेकिन आँखें ज़मीन पर टिकी रहती हैं।शायद सोचती है—“भैया क्या सोचेंगे?”शर्म आना बुरा नहीं है।लेकिन उस उम्र मेंखुद को उन रास्तों में धकेल देनाजहाँ सँभलना मुश्किल हो—ये ठीक नहीं।क्योंकि इस उम्र मेंकोई कंट्रोल सिखाने वाला होना चाहिए।कोई जो कहे—“थोड़ा रुक जाओ।”“पहले खुद को बना लो।”गलतियाँ इस उम्र में होती हैं—होनी भी चाहिए।लेकिन उन्हें समझनाऔर समय पर संभल जानाखुद की ही ज़िम्मेदारी होती है।मैं दुकानदार हूँ।समझाने का हक़ नहीं है मुझे।बस देखने का अनुभव है।और कभी-कभीदुकान पर खड़े-खड़ेसिर्फ़ सामान नहीं बिकता…कुछ उम्रें भीचुपचाप फिसलती हुई दिख जाती हैं।