मन भी कभी–कभी
बिना वजह चिड़चिड़ा क्यों हो जाता है।
जिसकी कोई साफ वजह मुझे समझ नहीं आता कि क्यों,
क्योंकि बात कुछ खास होती भी नहीं।
फिर भी भीतर एक अजीब–सा खिंचाव रहता है,
जैसे हर बात थोड़ी भारी लगने लगी हो।
शायद उस समय
मुझे ज़्यादा बोलने का मन नहीं होता।
शब्दों से ज़्यादा
चुप रहना अच्छा लगता है।
या फिर हो सकता है
कि उस पल
दूसरे काम ज़्यादा ज़रूरी लगने लगते हों।
या बस
खुद के साथ थोड़ा और समय बिताने की चाह
ज़्यादा गहरी हो जाती हो।
इसीलिए शायद
शब्दों का शोर अच्छा नहीं लगता।
लोगों की बातें नहीं,
अपनी खामोशी बुला रही होती है।
बिना वजह चिड़चिड़ा
कोई कमजोरी नहीं,
बल्कि
मेरी खामोशी की तरफ
एक इशारा है।
क्योंकि भीतर की
गहरी शांति
अक्सर
सबसे ज़्यादा सुकून देती है।
और शायद
यही असली संकेत है।
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