आज दुकान पर बैठा रहा
काम तो दुकान का कुछ खास किया नहीं,
ज़्यादा समय
मोबाइल ही हाथ में रहा।
ना कोई ज़रूरी कॉल थी,
ना कोई जरूरी काम।
बस यूँ ही
स्क्रीन ऊपर–नीचे करता रहा।
कभी किसी की पोस्ट,
कभी किसी की वीडियो,
कभी बिना वजह
समय काटता हुआ।
दुकान सामने खुली थी,
लेकिन मेरा ध्यान
कहीं और अटका हुआ था।
बात बाद में चुभी।
जब एक ग्राहक
दुकान के सामने आकर
थोड़ा रुका,
मुझे देखा
और फिर
चुपचाप
आगे बढ़ गया।
शायद
उसे लगा
कि मैं व्यस्त हूँ।
और सच कहूँ,
मैं वाकई व्यस्त था—
लेकिन किसी काम में नहीं,
बस मोबाइल में।
वो ग्राहक
बिना कुछ खरीदे लौट गया।
आजकल वैसे भी
काम कम है।
जो कभी–कभार
कोई आता है,
वो भी
ऐसे ही लौट जाए,
तो मन में
एक अजीब–सी बात
रह जाती है।
मोबाइल की यह आदत
धीरे–धीरे
ध्यान चुरा लेती है।
कई बार
दुकान खुली होती है,
सामान सामने होता है,
लेकिन मन
स्क्रीन के अंदर कहीं
भटका रहता है।
बाद में सोचता हूँ
कि मैं मोबाइल में
आख़िर कर क्या रहा था?
कोई बड़ा काम नहीं,
कोई खास नतीजा नहीं।
बस समय निकल गया।
मोबाइल ज़रूरी है,
इससे इंकार नहीं।
काम के लिए भी,
जानकारी के लिए भी।
लेकिन शायद
इतना ज़रूरी भी नहीं
कि सामने खड़े ग्राहक से
ज़्यादा ध्यान
उसे दे दिया जाए।
आज यह बात
देर से समझ में आई।
जब दुकान वही थी,
सामान वही था,
लेकिन ग्राहक
नहीं रहा।
शायद
दुकानदारी में
सिर्फ दुकान पर बैठना
काफी नहीं होता।
वहाँ मौजूद रहना
भी ज़रूरी होता है।
आज
दुकान पर बैठा रहा,
लेकिन पूरी तरह
दुकान में नहीं था।
और यह एहसास
दिन ढलने के बाद
मन में
थोड़ा सा
चुभ गया।
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