“जो रोज़ दुकान खोलता है, खुद को बंद रखता है
शीर्षक:
“दुकान के पीछे खड़ा आदमी”
उपशीर्षक:
जो रोज़ मुस्कुराता है, पर कभी आराम से बैठ नहीं पाता
यह किताब किसी बड़े बिज़नेस मैन की कहानी नहीं है।
यह उस आदमी की कहानी है
जो सुबह शटर उठाता है
और रात को सपने नीचे गिरा कर बंद करता है।
अगर आपने कभी
दुकान खोली है —
या दुकान खोली है, पर खुद को बंद पाया है —
तो यह किताब आपकी है।
दुकानदार को हम सिर्फ़
“दाम बढ़ा रहा है”
या “मुनाफ़ा कमा रहा है” समझते हैं।
पर कोई यह नहीं पूछता कि
वह हर दिन
अपने डर, थकान और ज़िम्मेदारियों के साथ
कैसे सौदा करता है।
यह किताब उसी चुप सौदे की आवाज़ है।
दुकानदार का सबसे बड़ा संघर्ष
पैसे की कमी नहीं है।
समस्या यह है कि
वह कभी छुट्टी नहीं ले पाता।
बीमार हो तो भी दुकान खुलती है।
उदास हो तो भी भाव पूछे जाते हैं।
उसका जीवन
“आज दुकान नहीं खुली”
जैसा कोई विकल्प नहीं जानता।
दुकानदार को सिखाया गया है —
“अगर दुकान बंद हुई,
तो घर का चूल्हा ठंडा होगा।”
इस डर ने
उसे मशीन बना दिया।
खुद से ज़्यादा
दुकान की परवाह करने वाला इंसान।
वह धीरे-धीरे
खुद से दूर होता चला गया।
दुकानदार भी चाहता है —
कभी बिना घड़ी देखे बैठना।
कभी बेटे की फीस के बिना हँसना।
कभी यह सोचना
कि अगर आज कमाया नहीं
तो भी वह ठीक है।
पर हर इच्छा
उधार पर चली जाती है।
समस्या यह नहीं कि
आप दुकानदार हैं।
समस्या यह है कि
आपने खुद को
सिर्फ़ दुकानदार मान लिया है।
आप पिता भी हैं।
आप इंसान भी हैं।
आप थकने के हक़दार भी हैं।
दुकान आपकी पहचान नहीं,
सिर्फ़ आपका साधन है।
हर दिन दुकान खोलने से पहले
एक सवाल खुद से पूछिए —
“आज मैं कैसा हूँ?”
और दुकान बंद करते समय
एक वाक्य खुद से कहिए —
“आज मैंने जितना किया,
वह काफ़ी है।”
यह अभ्यास
आपको इंसान बनाए रखेगा।
आज रात सोचिए —
क्या मेरी दुकान मेरे लिए है
या मैं दुकान के लिए?
अगर एक दिन दुकान बंद हो जाए,
तो क्या मैं फिर भी खुद को क़ीमती समझूँगा?
आख़िरी बार
मैंने खुद के लिए क्या किया था?
जवाब लिखना ज़रूरी नहीं,
महसूस करना काफ़ी है।
दुकानदार का जीवन
बिल, उधार, मोलभाव और डर के बीच चलता है।
पर उसके भीतर
एक इंसान है
जो सम्मान चाहता है,
सिर्फ़ ग्राहक नहीं।
अगर आप दुकानदार हैं —
तो यह याद रखिए:
आपकी दुकान
आपसे बड़ी नहीं है।
आपकी ज़िंदगी
आपकी बिक्री से ज़्यादा कीमती है।
शटर रोज़ उठे या न उठे,
आपका वजूद हमेशा खुला रहना चाहिए।
RohitShabd
कम शब्दों में गहरी बात
यह माइक्रो-बुक
उन सभी लोगों के लिए है
जो मेहनत तो करते हैं
पर खुद के लिए रुकना भूल जाते हैं।
“दुकानदार की सबसे बड़ी कमाई पैसा नहीं,
हर दिन फिर से खड़े होने की हिम्मत है।”
“दुकान बंद हो सकती है,
पर इंसान को बंद नहीं होना चाहिए।”
“सुबह शटर उठता है…
शाम को थकान गिरती है…
और बीच में
एक आदमी खुद को भूल जाता है।”
“दुकानदार होना पेशा है,
खुद को खो देना मजबूरी नहीं।”