भीड़ में खोई आवाज – एक आम आदमी की चुप्पी की डायरी | मनघड़ंत बाते

भीड़ में खोई आवाज
कभी-कभी यह मन अजीब होता है।
और खुद ही बातें गढ़ लेता है,
खुद ही कहानियाँ बुनता है,
कभी गुस्से से भर जाता है,
तो कभी मोहब्बत में पिघल जाता है।

ये मन…
किसी की सुनता नहीं,
बस अपनी मनगढ़ंत बातें करता रहता है।
कुछ सुनी, कुछ देखी, कुछ खुद की बनाई—
यह सब अपने अंदर ही घोंटता रहता है।


मन की खामोशी

मैं कभी लाइन में खड़ा होता हूँ—
और कोई अचानक आगे घुस कर पूरे नियम तोड़ देता है।

गुस्सा आता है।
बहुत आता है।

पर क्या कर पाता हूँ?
कुछ नहीं।
सिर्फ मन-ही-मन कोसते हुए पीछे खिसक जाता हूँ।


सॉरी का बोझ और थोप दी गई शांति

कभी कोई धक्का मार जाता है,
टक्कर दे जाता है,
और बस एक “सॉरी” कहकर निकल जाता है—

जैसे उस एक शब्द ने
बस सब ठीक कर दिया हो,
जैसे मेरी तकलीफ़, मेरी जगह, मेरी इज़्ज़त
अब उसकी मर्ज़ी पर चल रही हो।


छोटी-छोटी शर्म, बड़े-बड़े घाव

किसी सड़क पर कोई गंदी गाली दे देता है,
बिना वजह, बिना सोच…
जैसे हम इंसान नहीं,
बस कोई चलती-फिरती चीज़ हैं।

और हद तो तब होती है,
जब एक छोटी लड़की भी लेडीज़ सीट के नाम पर
अकड़ कर खड़ा कर देती है—
ना शर्म, ना लाज,
सिर्फ अधिकार का गलत अर्थ।

और गुस्सा?
वो मन में ही रह जाता है।


सड़क की बदतमीज़ियाँ और हमारी मजबूरियाँ

बिना कानों में ईयरफ़ोन लगाए
मोबाइल पर तेज़ गाना बजाने वाले लोग,
बस स्टैंड पर गुटका थूक कर
दूसरों के कपड़ों पर छींटे गिरा देने वाले,
मेट्रो में धक्का देकर निकल जाने वाले…
इन सबके सामने हम बस खड़े रह जाते हैं।

गुस्सा आता है,
पर बोलते नहीं।
शब्द गले में उलझ कर रह जाते हैं।


सिस्टम में फंसा एक आम आदमी

पुलिस स्टेशन में FIR कराने जाओ
तो चक्कर पर चक्कर।
कोर्ट में तारीख़ पर तारीख़।
पुलिस वाला “चालन” की जगह
जेब में नोट रख ले,
और पूछो तो जवाब—
“चुपचाप निकलो।”

डीटीसी बस का कंडक्टर
पूरे पैसे लेकर भी टिकट न दे
और बोले—
“बैठ जाओ, आराम से उतर जाना…”
तो मन में फिर वही सवाल—
हम गलत हैं या सिस्टम?


मन की मनगढ़ंत बातें असल में मन की सच्चाई हैं

लोग कहते हैं मन बातें गढ़ता है।
लेकिन क्या यह गढ़ना है—
या हमारे समाज की सच्चाई?

यह मन जो बोल नहीं पाता,
वो भीतर नोट करता जाता है—
हर धक्का, हर अपमान,
हर अन्याय, हर चुप्पी।

हम आम लोग हैं।
ज्यादा कुछ समझ नहीं आता।
बस इतना पता है कि
हम गलत नहीं हैं—
बस अकेले हैं।


निष्कर्ष – मन क्यों गढ़ता है बातें?

क्योंकि बाहर की दुनिया
हमारी बात सुनने के लिए तैयार नहीं।

इसलिए मन अपने भीतर
एक दूसरा संसार बना लेता है—
जहाँ गुस्सा बोल सकता है,
जहाँ दुख रो सकता है,
जहाँ इज़्ज़त मरम्मत पा सकती है।

मन की मनगढ़ंत बातें
असल में झूठ नहीं,
वो हमारे सच का दूसरा नाम हैं।


अगर आप भी ऐसा महसूस करते हैं

तो जान लीजिए—
आप अकेले नहीं।
हम बहुत हैं।
बस भीड़ में खोई आवाज


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