भूल जाता हूँ, भटक जाता हूँ, शायद बेहोशी के आलम कही मैं खो भी जाता हूँ।
कभी-कभी जीवन में ऐसा लगता है जैसे हम अपनी ही चुनी हुई राहों से दूर हो गए हैं।
ठोकर हमे क्या सिखाती है :

अपनी चुनी हुई राहों से फिर ठोकर खाकर होश में आता हूँ। जीवन की राहों में ठोकरें आना असामान्य नहीं है।कभी-कभी हम गलत दिशा में चले जाते हैं, लेकिन वही अनुभव हमें फिर से जागरूक बनाता है।ठोकरें हमें यह सिखाती हैं कि रास्ते बदल सकते हैं मन भटक सकता हैलेकिन इंसान फिर संभल भी सकता है।
लेकिन फिर भी संभल भी जाता हूँ चलना, हालांकि दौड़ना फिर से सीख कर जल्द वापस आ मैं जाता हूँ।
फिर अपनी पसंदीदा राहों पर, इसलिए उन राहों से कैसे दूर मैं रहु जिन राहों पर कदम रख रख बड़ा हुआ हूँ मैं।
उन्ही राहों से मैंने जीना सीखा है, उन राहों से ही जिंदगी का हर पहलू समझ आया है।
मुझे उन राहों पर ही चलना पसंद है जिन राहों पर मैंने जीवन का रस पाया है।
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