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धर्म के नाम पर

धर्म के नाम पर दंगे ना कर। तू हिन्दू है या मुसलमान जो भी हो पहले इंसान बन।

इस फोटो को कोई एक्सप्लेन करेगा ??
लगातार जब मै कोई पोस्ट डालता हूं तो लगातार मेरे साथ जिन्होंने बहुत अच्छा समय बिताया है वो मुझसे आकर बोलते है, कमेंट करते है धर्म , मजहब , हिन्दू , मुस्लिम यही सब बोलते है लेकिन मेरा धर्म इंसानियत है जैसा श्री मदभागवत गीता जी में उपदेश दिया गया है। और मै उसीको अपने आचरण में लगातार लाने के लिए प्रयासरत हूं मुझे तुम्हारी तरह नहीं बनना बिल्कुल भी नहीं बनना।
“धर्म को धारण करना धर्म कहलाता है” धारण अर्थात
और वो सनातन है आजकल असमाजिक तत्व अपनी तरह से तोड़ मरोड़ कर धर्म बना रहे है और बिगाड़ रहे है जिसे धर्म नहीं कहते और वो धर्म नहीं हो सकता जिसमे लड़ाई झगड़ा आदि सिखाया जाए।

धर्म के नाम पर
धर्म के नाम पर

मुझे तो नहीं लग रहा की ये दोनों भाई है जिस तरह से इन लोगो झगड़ा किया है क्या वो भाई भाई करते है ??
जवाब आपके पास है मेरे पास तो बिल्कुल नहीं है।

क्या यहां दो भाई लिखना उचित था ?? इस तरह के विचार रखने वाला व्यक्ति मेरा भाई कैसे हुआ ???
मेरे विचार , मेरे संस्कार तो इस तरह का उपद्रव करने के संस्कार नहीं देते
मेरे अंदर क्रोध , घृणा , अहंकार , लालच , हो सकता है लेकिन क्या इस हद तक है ??
बिल्कुल नहीं है और ना ही कभी होगा क्युकी यह इंसानियत नहीं है , आजकल लोग इंसान नहीं बनना चाहते वो हिन्दू – मुस्लिम बनना चाहते है यह आपको बनना है यह आपका रास्ता है मेरा नहीं और मै ऐसे आडंबर , ढोंगी,सत्ता के लालची लोगो की तरह बनने का बिल्कुल इच्छुक नहीं हूं।
यह दो भाई लड़ रहे है आपस नुक़सान किसका हुआ ??

आपकी जमीन ,आपका घर , और आपके आसपास के लोगों का भी आपने घर , मकान , गाडियां यह सब जला दिया लेकिन किसलिए यह तो बता दो ??
हॉस्पिटल बंद रहेगा उस एरिया में सिर्फ तुम दो भाई लोगो की वजह से
रोड पर खड़ी रिक्शा और गाडियां सब जलाई तुम दो भाईयो ने , अब स्कूल कैसे जाएंगे बच्चे , हॉस्पिटल में दवाई तो तुम ही लोग लेने जाते हो अबकही ओर जाओगे पैसे भी तुम्हारे खर्च होंगे या कोई और आएगा ??

रोड तोड़ दी अब सरकार बनवाए तुम्हारे लिए ??
हॉस्पिटल बनवाए तुम्हारे लिए ताकि तुम फिर तोड़ दो
मस्जिद, मंदिर तोड़ दिए अब कहां जाओगे वैसे तुम दोनों भाई इस लायक नहीं हो की मंदिर ओर मस्जिद जाओ तुम्हे इतनी अक्ल ही नहीं है कि लड़ाई नहीं करते लड़ाई भी ऐसी मेरे पास लफ्ज़ भी नहीं है तुम दी भाईयो के लिए।
बहुत गुस्सा आ रहा है तुम दोनों भाइयों के लिए कितना लिखूं उतना कम है बेशर्मी की सारी हदे पार तुमने कर दी।

यह भी पढे: संतोष ही परम धर्म है, मनुष्य होना मेरा भाग्य, वो सहम वो डर गए,

चुनाव के बाद


चुनाव के बाद क्या होता है, आप सभी एक बात समझिए हम लोग क्या देखते है ? क्या पढ़ते है ? टीवी देखते है और अख़बार पढ़ते है आजकल तो क्या दिखाया जा रहा है और क्या पढ़ाया हा रहा है यह सबको पता है इसके साथ ही मोबाइल के द्वारा हम सोशल मीडिया पर जो समय बिताते है उसमे भी बहुत सारी बाते झूठी होती है और कुछ वॉट्सएप बाबा का ज्ञान अब किस पर विश्वास करे ओर किस पर नहीं यह हम सभी के लिए एक चुनौती भरा विषय है।

हम सभी लोग अपने अनुभव पर वोट दे रहे है जैसा हम लोगो के साथ हो रहा है उसी के आधार पर वोट जाता है जो सुनते है देखते है बस वही सब इसी आधार पर वोट दिया गया है यह बात स्पष्ट हो चुकी है।

दिल्ली वालो के बारे में बहुत कुछ लोग बोल रहे है लगातार कुछ ना कुछ लिखा जा रहा है दिल्ली वाले मुफ्तखोर हो गए है दो कौड़ी की बिजली पानी के लिए बिक गए है।

दिल्ली की जनता ने फ्री के लिए कोई वोट नहीं किया उन्होंने काम भी किया इस बात से आपको सहमत होना चाहिए हर बात में नकारना गलत बात है। और काम नहीं भी किए ऐसा भी है। उसके लिए मै दुबारा लिखूंगा की उन्होंने क्या किया है और क्या नहीं

यह बात बहुत गलत है जिस प्रकार से लोग अपनी प्रतिक्रिया दे रहे है उन्हें सोच समझकर बोलना चाहिए।

कौन किसको वोट देना चाहता है यह उसका मौलिक अधिकार है आप उसे उसका निर्णय लेने से नहीं रोक सकते

बहुत सारे विचार मंथन करते हुए लोगो ने अपना दिया है और इस बात को स्वीकार करना चाहिए

जीत अब किसी भी पार्टी की हुईं है इसका यह तात्पर्य नहीं है आपको देशद्रोही बोलने का अधिकार है दिल्ली देश की राजधानी है और यह अधिकार आपको बिल्कुल भी नहीं है कि आप अभद्र शब्दो का प्रयोग करे

अपने शब्दो पर नियंत्रण रखना अतिआवश्यक है बहुत जल्दी कुछ लोग अपना आपा खो देते है यदि आप स्वयं  विवेकी नहीं हो तो आप दूसरों को क्यों कोश रहे हो ??

खुद के विचार इतने सीमित दायरे में सिमट गए और आप इल्जाम दिल्ली की जनता पर लगा रहे है।

यह समय आत्ममंथन का है , देशमंथन, विचारमंथन का है दिल्ली मंथन का है अपने विचार ओर मत के लिए ही अपना नेता चुनने का अधिकार दिया है और उसके चलते ही दिल्ली का चुनाव तय हुआ है, अब आप इसमें घृणा के बीज ना बोए तो बेहतर है।

चुनाव के बाद सोचिए और समझिए।

पंगा फिल्म

इस वक्त इस बात को कहने में कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि वर्तमान समय में कंगना बहुत ही बेहतरीन अदाकारा हैं , पंगा फिल्म केवल एक फिल्म भर नहीं बल्कि सपनों को पूरा करने में केवल जया निगम ही नहीं बल्कि भारत और दुनिया के अन्य देशों की “जया” भी पीछे हट जाती हैं ।

विवाह के बाद नौकरी छूटना या छोड़ना आम बात है तो खेलों की तरफ देखना तो और भी मुश्किल होता है । पति और बच्चों का साथ न देना या देने भर का नाटक भी देखा जाता है ।

अपने सपनों को छोड़ पति और बच्चों के सपनों और जरूरतों को पूरा करने में जुड़ जाना आज भी औरतें अपना परम सौभाग्य मानती हैं ।

पंगा फिल्म कंगना की अदाकारी के साथ साथ अश्विनी तिवारी की दाद देनी होगी जिन्होंने इतनी बारीकी से खेल,परिवार ,शादी और उसके बाद के जीवन को पर्दे पर उकेरा # देखना तो बनता है
साथ साथ नीना गुप्ता की एक्टिंग भी बहुत अच्छी है जिस तरह से उन्होंने एक मां का किरदार निभाया है  इस फिल्म को बहुत ही बारीकी से पिरोया गया सारे सपने पूरे नहीं होते लेकिन जिद्द हो तो उन्हें पूरा करने की तो कोई सपना अधूरा भी नहीं रह सकता।

पंगा फिल्म
panga movie

इसमें औरत अपनी बात को किस तरह से मनवाती है वो भी बहुत खूबसूरती के साथ दिखाया गया है फिल्म के  कुछ दृश्य तो आपका मन पूरी तरह से मोह लेते है मै पहले से ही कंगना का फैन हू इस फिल्म को देखने के बाद और भी ज्यादा बड़ा फं हो गया क्युकी एक औरत को सेंटरिक करके फिल्म को बड़े स्तर तक ले जाना कोई आसान बात नहीं होती।

लेकिन जिस तरह से इस फिल्म बनाया गया है उसमे परिवार , अपने सपने और नौकरी आदि की सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया गया है इसलिए फिल्म को जरूर देखने जाइए और अपने सपनों को पूरा करने इच्छा को कभी मरने मत दीजिए

कोशिश कामयाब होती है

पिछले काफी से सालो से मै कोशिश कर रहा हू लेकिन मेरी सभी कोशिश नाकाम हो रही थी क्या इस बार भी मेरी कोशिश नाकाम होगी या साकाम ?

मेरी जिंदगी में काफी उथल पुथल हो रही थी जो मुझे खुद ही नहीं समझ आ रही थी कि ये सब मुझे किस और के जाएगी ? क्या यह सारी घटनाएं मुझे मेरी मंजिल की ओर इशारा कर रही थी ? या फिर कोई और रास्ता दिखा रही थी?

इस साल यह जिंदगी का सबसे अहम साल होने वाला है जिसमे बताना कुछ ना चाहूं बस सबकुछ कर देना मै चाहता हू जो अभी तक सोचा था मैने जिस जिंदगी की दौड़ का हिस्सा होना चाहता हू बस अब वहीं रुख और तेज़ी से करना चाहता हू मै खुद को विपरित दिशा में ले जा रहा था लेकिन अब मै फिर से उसी और मुख कर रहा हू,
बाहर से विमुख होकर भीतर की और अब मै बढ़ रहा हू।

बहुत रुकावटें आई बहुत लोगो ने रोकना चाहा कुछ ना कुछ होता ही गया और बहुत सारी चीजों में मै उलझ भी गया खुद पर काबू ना कर पाया और बेकाबू हो गया,
जिसकी वजह से मेरा सालो का सपना कहीं गुम हो गया और मै अपनी जिंदगी में बहुत पीछे छूट गयाना चाहकर पर भी अपनी मंजिल से भटक गया।

अब उस मंजिल की ओर फिर से निकलने का वक़्त आ गया है। अब उन रुकावटों पर वो परेशानियां क्या फिर से आएगी,
और यदि आएगी भी तो क्या मै उन परेशानियों की वजह से फिर रुक जाऊंगा ?

खुद को मजबूत करना है खुद से वादा था मेरा जो मुझे पूरा करना है। क्या वो वादा झूठा हो जाएगा या मै अपनी मंजिल की ओर निकल चलूंगा ? क्या अपना सपना पूरा कर सकूंगा ?

सवाल बहुत सारे है इस मस्तिष्क में कहीं मै फिर से कमजोर तो नहीं पड़ जाऊंगा ? फिर कहीं मै अपनी मंजिल को भूल तो नहीं जाऊंगा ? फिर कहीं रास्ता तो नहीं भटक जाऊंगा ?

मुझे मजबूत करने के लिए जीवन में कई ऐसे लोग आए जिन्होंने मेरे जीवन की सोच को सम्पूर्ण तरह से बदल दिया उनका मै हमेशा से शुक्रगुजार हूं मेरी आगे की यात्रा अब उन्हीं की वजह से तय होगी जिन्होंने मुझे झंझोड दिया है पूरी तरह से

मेरा दिमाग और दिल अब अपनी मंजिल की ओर सिर्फ पिछले बीते समय के कारण ही होगा उसी जीवन के कारण मेरे आगे के जीवन को दिशा मिल रही है।




#monklife #monk #life #Lifestyle #journey #innerjourney #shabd #wordpower

तानहा जी

पिछले हफ्ते दो बड़ी फिल्में रिलीज हुई तानहा जी और छपाक
जिसमे ऐसा हुआ कि तानहा जी तन्हा तन्हा कहते हुए ऊपर निकल गई और छपाक़ धपाक से नीचे गिर गई
छपाक और तान्हा जी दोनों ही फिल्में सिर्फ एक बार देखने लायक है जितना इन दोनों फिल्मों का हंगामा मचाया जा रहा था दोनों इतनी गजब की नहीं है जितना लोगो ने फिल्म को देखने और ना देखने पर शोर मचा रखा था लेकिन दोनों फिल्म देखने के बाद यह निष्कर्ष निकला की यह दोनों फिल्में साल की सुपरहिट फिल्मों में से कोई एक नहीं है।

जहां Tanha Ji को 3.5 की रेटिंग देनी चाहिए थी वहां लोगो ने बहुत ज्यादा ही कर रखी है और छपाक को 2.5 रेटिंग मिलनी चाहिए थी वहां उसे भी लोगो ने जबरदस्ती में ऊपर उठा रखा है।
वैसे लोगो के मन की बात भी के दू मै लोग दोनों ही फिल्म देखना चाहते थे लेकिन इतना सबकुछ उल्टा सबकुछ सोशल मीडिया पर फैला कर सब रायता कर दिया जिसकी वजह से Tanha Ji को फायदा हो ओर छपाक धपक से नीचे गिर गई।

तानहा जी फिल्म में दो बड़े सुपरस्टार थे जिनकी एक्टिंग की वजह से यह फिल्म हिट हो गई वरना फिल्म में कोई खास दम नहीं था काजोल का फिल्म नाम ही था लेकिन एक्टिंग के नाम पर कुछ नहीं दिखाया गया वहीं दूसरी और दीपिका पादुकोण की एक्टिंग बहुत बेहतरीन है फिल्म में कहीं कही पर वो निराश कर देती है कुछ सीन में वो इमोशन नहीं झलकते लेकिन उनको इग्नोर किया जा सकता है ऐसा ही Tanha Ji में भी हुआ की इमोशन पर काम नहीं किया गया।
अगर आप सभी दीपिका पादुकोण के JNU जाने की नाराज़गी से उभर गए तो फिल्म देखकर आ सकते हो और TANHA JI भी देखिए पैसे वसूल है दोनों ही फिल्में
इन झगड़ों दंगे फसाद से कुछ नहीं मिलने वाला गुस्से में घर अपना ही जलता है दूसरे तो आकर हाथ सेकते है हुजूर इसलिए लोगो को हाथ सेकने का मौका ना दे
और मैं दोनों पक्षों को देखता हू , दोनों की बुराई और अच्छाई को सरहना करता हू मेरे लिए सभी समान है
ना मै किसी से नफ़रत करता हू ना ही प्रेम

तानहा जी
तानहा जी

जहरीले पेय पदार्थ

जहरीले पेय पदार्थ का सेवन बंद करे जब आप किसी चीज पर ध्यान नहीं देते तो वो आपके दिल और दिमाग दोनों से बहुत दूर हो जाती है और लगता है वो अब आपके आसपास है ही नहीं या फिर अस्तित्व ही ख़तम हो गया है ऐसा ही हुआ पेप्सी के साथ भी कल यह बोर्ड देखकर ध्यान आया कि यह भी जिंदगी का अहम हिस्सा था जिसे मै लगातार पिया करता था

यह मेरी एक एडिक्शन ही थी क्युकी जब मै दिन का खाना खाता था तब भी यह चाहिए होती थी , और किसी भी समय पीने का मन करता था तो लेके आया करता था  लेकिन आज इसका ध्यान भी नहीं आता। यदि आपकी जिंदगी में कुछ अहम बाते जो आपको परेशान कर रही है तो उनकी ओर ध्यान देना बंद करदे ओर कहीं ध्यान लगाए बहुत जल्द ही आप पाएंगे कि वो आपकी जिंदगी से दूर है अब अब उनकी जगह कोई और लेने लग गया है। जिस चीज के लिए आप बहुत पोसेसिव थे अब वो धीरे धीरे ख़तम होने लग गई है

उस समय कोल्ड ड्रिंक की वजह से मेरा पेट बिल्कुल खराब होने लग गया था और मेरा पाचन तंत्र बिल्कुल नष्ट हो रहा था जब भी कुछ खाता मुझे पता नहीं था और यह परेशानी दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी जिसका परिणाम मेरा मेरा पेट बिल्कुल खराब और में डरता था कुछ भी खाने से किसी भी समय मै कुछ खा नहीं पा पाता था।

मुझे बार बार पेट को साफ करने के लिए वॉशरूम जाना पड़ता था। और कोल्ड ड्रिंक की वजह से मेरे दांतो के कमजोरी आयी और आज लगभग 5 साल हो गए मुझे कोल्ड ड्रिंक को छोड़े हुए अब में सिर्फ कभी कभार मतलब 4-6 महीने में ले ली तो ठीक वरना नहीं क्युकी अब में कोल्ड के बारे में सोचता भी नहीं हू।, और अब जहरीले पेय पदार्थ का सेवन अब बंद हुआ।
अब मै इस प्रकार के पेय पदार्थो से दूर रहता हू और दूसरो को भी यही सलाह देता हूं कि इस प्रकार के पेय पदार्थो से दूर रहे जूस, नींबू पानी , जलजीरा आदि   का सेवन अधिक से अधिक करे।

पहाड़ गंज

पहाड़ गंज एरिया की कृष्णा गली घी मंडी चौक की तारे बहुत सारे लोगो के लिए एक ऐसा स्पॉट बना हुआ

जिसे देख कर बहुत सारे लोग स्तब्ध हो जाते है, कभी सिर झुक कर चलते है तो कभी ऐसे देखते है, जैसे उन्होंने पहले कभी तारे देखि ही नहीं।

इन बिजली, केबल , वाईफाई, टेलीफोन की तारों देखने के बाद लोगो के पास शब्द नही होते और उन तारो को देखकर फ़ोटो खिंचने लग जाते है।

जब विदेशी पर्यटक इस गली से गुजरते है तो वह इन तारो की फोटोज लेते है, और इनकी ड्राइंग भी बनाते है, आज से थोड़े टाइम पहले मेरी मुलाकात साशा बेजुरोव से हुई थी जो बहुत ही मशहूर फोटोग्राफर है उन्होंने भी इन तारो की बहुत सारी फोटोज ली एवं चित्र भी बनाया था।

कहने का तात्पर्य यह है, कि यह तारे सभी को अचंभित करती है क्युकी यह बहुत नीचे है, तथा आने जाने वालो को परेशानी भी होती है यह पूरी तरह से एक झुंड बनाए हुए है।

इनको यह नीचे लटकी हुई तारे बड़ी अदभुत सी लगती है, मानो उन्होंने ऐसे तारो को नीचे की और कभी देखा ना हो, यह नजारा कभी देखा ही ना हो इसलिए यह तारे उन्हें आकर्षित करती है, परंतु यह तारे खतरनाक तारे है, यदि किसी दिन कोई हादसा हो गया तो कौन कैसे बच पायेगा एक तो पहाड़ गंज की गालियां इतनी संकरी और उसके बाद यह नीचे लटकी हुए तारे जिनका कोई समाधान नही मिल रहा है।

क्या इनका कोई समाधान है ? क्या सरकार इन लटकी हुई तारो के बारे में कुछ सोच रही है , यह तारे सिर्फ पहाड़ गंज में ही नही है। दिल्ली की काफी जगह ऐसी जहाँ इस प्रकार से तारे लटकी हुई है , नई सड़क, चावड़ी बाजार , चांदनी चौक आदि जगहों पर भी इसी तरह से तारे नीचे की और लटकी हुई है, तथा इससे भी बदतर हालात में है, और इनका कोई समाधान होता हुआ नही दिख रहा है।

दिल्ली की काफी जगह ऐसी जहाँ इस प्रकार से तारे लटकी हुई है , नई सड़क, चावड़ी बाजार , चांदनी चौक, आदि जगहों पर भी इसी तरह से तारे नीचे की और लटकी हुई है, तथा इससे भी बदतर हालात में है, और इनका कोई समाधान होता हुआ नही दिख रहा है।

महिला हाट

अब महिला हाट में संडे बुक बाजार लगने लगा है जिसका कोई भी समर्थन नहीं कर रहा था लेकिन कुछ लोगों की साजिश ओर कुछ लोगों की मजबूरई जो यह सब करना पड़ रहा है, किताब का छोटा शहर वीरान करने की एक साजिश चल रही है जो पूरी तरह से कामयाब होती दिख रही है। लगता है MCD अपने गलत बयान और पुलिस की सहायता से दरियागंज संडे बुक बाजार के लोगो को वहाँ से हटा देगी। पिछले 3 दिन से लगातार में अखबारों मैं पढ़ रहा हूं कि “संडे बुक बाजार के लोगो को मिला नया ठिकाना” अब मेरा प्रश्न यह है कि कितने लोग राज़ी हुए जरा हमे ये तो बताना
क्या आप जबरदस्ती अपना कुशासन चलाना चाहते हो ?
ये हमे बताना

हम तो वहाँ नही बैठना चाहते फिर काहे तुम चाहते हो जबरदस्ती हमे वहाँ बैठाना ? जरा हमको यह आप समझाना15rs लगते थे अब उसके 200rs आप ले लोगे हमसे
2 घंटे किताबों को लगाने में लगेंगे और 2 घंटे किताबों हटाने में लगेंगे।
एक समय पर 276 लोग जब हर हफ्ते वहाँ जाएंगे तो चक्का जाम हो जाएगा घण्टो का समय तो हमारा यू ही बर्बाद हो जाएगा। क्या तब ट्रैफिक जाम नजर नही आएगा ?क्या रिक्सा , ठेला पूरा महिला हाट में घूम पायेगा ?

कुछ किताबे लगाने से क्या वो अच्छा काम कर पायेगा ?जितने का माल बिकेगा उतना तो मेरा खर्चा हो जाएगा फिर घर पर क्या ठेंगा लाएगा।संडे बुक बाजार का नाम महिला हाट के नाम के नीचे दब जाएगा।मेरा तो अस्तित्व ही खो जाएगाहमारी मदद के लिए क्या कोई आगे आएगा ?
क्या आप हमारा साथ दोगे ?इस संडे को हमारे साथ आकर

आप सभी से एक बिनती है की इस “संडे बुक बाजार” दिल्ली गेट मेट्रो गेट नंबर 3 पर आप सभी हमारे मिलकर जुड़े और हमारा साथ दे संडे बुक बाजार को बचाने के लिए, क्युकी हम महिला हाट का बहिष्कार करते है।

बारिश की उन बूंदों

एक प्यारी सी कविता जिसमे मेरा बचपन कही छूट गया है, बारिश की उन बूंदों ने इस बात आज मुझे एहसास दिलाया है।

फिर से आज एहसास हुआ है मुझको
की मेरा बचपन कही छूट गया है

उन छोटी छोटी खुशियों से
शायद मेरा रिश्ता अब टूट गया

बारिश की उन बूंदों ने आज एहसास दिलाया है
बहुत दूर निकल आया हूं बचपन के
उन नन्हे नन्हे हाथो से , उन नन्हे नन्हे कदमो से
जो थका कभी नही करते थे
घंटो खेलने के बाद भी कुछ देर और खेल लू क्या? बस यही कहा करते थे

वो बचपन की बाते बड़ी अजीब सी होती थी, जो खुद को तो समझ आती थी लेकिन औरो को पागल बहुत बनाती थी

उसी के चलते आज एहसास हुआ की मेरा बचपन
कही पीछे छूट गया है

जिंदगी से जिंदगी का नाता
थोड़ा कम और थोड़ा ज्यादा
बस छूट गया है

सवाल बहुत किये अपने आपसे
जवाब यही था
की मेरा बचपन कही पीछे छूट गया है

आज फिर बारिश की बूंदों ने यह एहसास दिला दिया है
प्यार से भरा और प्यारा था मेरा बचपन जिसमे गम ना था , ये हर रोज की आपाधापी ना थी वो लड़कपन और कुछ शरारते थी , बतमीजी थी बहुत लेकिन दिल में मैल नही था

आज एहसास हुआ मुझे की मेरा
बचपन जो कही छूट गया है

बारिश में भीग जाने का डर नही था,
बारिश में भीगने से घमोरियां ठीक हो जाएगी
इसलिए बारिश में भीग जाया हम करते थे,
आज मोबाइल रखा है जेब में इस बात से डरा हम करते है

आज आधुनिक तकनीको ने छीन लिए वो सारे खेल
जिनकी वजह से ही होते थे हम बच्चो के दिल के मेल

घंटो मिट्टी में खेला हम करते थे,
कपड़े गंदे होंगे इस बात से घबराया नही करते थे
आज हल्की सी शर्ट की क्रीज खराब न हो जाए,
इस बात से भी चीड़ हम जाते है

तब लड़ाई सिर्फ ताकत बढ़ाने के लिए होती थी
आज ताकत दिखाने के लिए लड़ा हम करते है।

उन छोटे छोटे कदम और
नंगे पांव से मिलो का सफर
तय हम कर लेते थे

कांटे चुभ रहे है या नही
इस बात पर भी सोचा हम नही करते थे

खेलते थे खूब
जब तक मन करता था
घर जाना है
हम इस बात पर भी सोचा नही करते थे
आज एक मिनट देर हो जाए
फ़ोन पर फ़ोन बज जाया करते है

थक जाने के बाद हम यह नही देखते थे
फर्श है या गद्दे वाला पिलंग बस जहा
जगह मिली सो जाया हम करते थे

एक टिफिन में चार लोग खा लेते थे
एक पिलंग पर चार लोग सो जाते थे
एक बल्ले से 10 लोग खेल लेते थे
3 दोस्त
3 रुपये के प्लास्टिक वाले अंडे में
1-1 रुपया मिलाकर ले आते थे।
हॉफ प्लेट चाऊमीन में 3 दोस्त घपड घपड खा लेते थे,
गली में जगह नही खेलने की तो गली को अपने तरीके से मोड़ हम लेते थे

एक किराये की साईकल लेकर
उस पर तीन लोग सवार हो जाते थे

लेकिन

आज मत भेदों ने इस तरह से घेर रखा है
की हम कहने लगे है यह तेरा है यह मेरा है

आज एहसास हुआ है कि
मेरा बचपन कही छूट गया है

अधूरी ख्वाइश

ना जाने कितनी ही अधूरी ख़्वाइसे है मेरी
लेकिन
वो सारी ख़्वाइसे तुम पर आकर पूरी हो जाती है।

ना जाने कितनी उम्मीद है मेरी आंखों में तुम्हे पाने की तुम्हे अपना बनाने की
लेकिन
तुम्हारे ना कहने पर वो सारी उम्मीद टूटकर चकनाचुर हो जाती है

ना जाने इन आँखों में कितनी गहरी नींद है
जो पूरी ही नही होती
लेकिन तुम्हारी एक याद से वो सारी नींद टूट जाती है।

ना जाने कितना प्रेम है, जो कभी क्रोध ही नही आता
लेकिन तुम्हारे दूर होने पर वो भरम भी टूट जाता है।

ना जाने कितने अरमान है तुझे पाने के
लेकिन वो अरमान सारे फीके हो जाते है
जब तू कहती है की मैं किसी और का अरमान हूं
और मेरा अरमान भी कुछ और है

लगता है कितना अधूरा हूं मै तेरे बिना लेकिन
वो अधूरापन तब दूर हो जाता है जब तू पास आ जाती है

फिर दुबारा ये भी एक भरम में तब्दील हो जाता है जब तू मुझे छोड़ कर दूर चली जाती है

“लगता है सदियों से अधूरा हूं ‘तुम बिन’ फिर भी
ना जाने क्यों हर जन्म में साथ तेरा मेरा छूट जाता है”

क्या मेरी इन आंखों में अश्क़ है या मोती ?
जो समझ ही ना आते है
( मेरी इन आंखों में अश्क़ है या मोती यह मुझे समझ ही नही आता है )
लेकिन हाँ
जब जमीन पर गिरते है तो दरिया सा बन जाता है।

एक एह्सास है गहरा सा जो
तुम्हारे हर वक़्त पास होने का भर्म मिटाता है
और
यही एह्सास है जो मुझे तेरे हर जन्म में करीब लाता है

रोहित शब्द