दुकान पर बैठे-बैठे
अक्सर ऐसा लगता है
कि समय बस कट रहा है।
ग्राहक कम हैं,
काम धीमा है,
और दिन एक-सा बीत जाता है।
लेकिन कभी-कभी
इसी ठहरे हुए समय में
एक बात धीरे से उभरती है—
क्या यह वक्त
सिर्फ इंतज़ार करने के लिए है,
या खुद को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए भी?
दुकान पर बैठा दुकानदार
सिर्फ सामान का रखवाला नहीं होता।
वह रोज़
लोगों को देखता है,
उनकी ज़रूरतें समझता है,
उनके सवाल सुनता है।
यही अनुभव
किसी किताब से नहीं मिलता।
जब काम कम होता है,
तो मन भटकता है।
कभी मोबाइल में,
कभी बेकार की सोच में।
लेकिन अगर उसी समय
दुकान को नए नज़रिए से देखा जाए—
तो बहुत कुछ बदला जा सकता है।
दुकान की साज-सज्जा,
सामान की प्रस्तुति,
ग्राहक से बात करने का तरीका—
ये सब
धीरे-धीरे सुधारे जा सकते हैं।
बिना किसी शोर के,
बिना किसी बड़े खर्च के।
आज का समय
सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं है।
जो दुकानदार
ऑफलाइन बैठा है,
वह भी
ऑनलाइन दुनिया से जुड़ सकता है।
दुकान का एक छोटा-सा परिचय,
सामान की तस्वीरें,
या बस
अपनी मौजूदगी का एहसास—
इतना ही काफी होता है
पहला कदम रखने के लिए।
ऑनलाइन जाना
दुकान छोड़ना नहीं होता।
यह दुकान को
थोड़ा आगे बढ़ाना होता है।
जहाँ ग्राहक
सिर्फ सामने से नहीं,
दूर से भी
आप तक पहुँच सकता है।
छोटा व्यवसाय
एक दिन में बड़ा नहीं बनता।
लेकिन रोज़
थोड़ा-सा सुधार,
थोड़ा-सा ध्यान,
और थोड़ा-सा नया सोचने का साहस—
इसी से
व्यवसाय धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।
शायद
दुकान पर बैठा यह खाली-सा वक्त
दरअसल
एक मौका है—
खुद को समझने का,
दुकान को सँवारने का,
और अपने छोटे व्यवसाय को
एक नए रास्ते पर ले जाने का।
दुकान पर बैठे-बैठे सारे काम स्वयं नहीं हो जाते उन्हें करना पड़ता है तभी कार्य होते है।
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