दुकान पर बीती उम्र : जब दुकान छोड़ना मन और शरीर दोनों के लिए मुश्किल हो जाता है।

दुकान पर बीती उम्र : बैठे-बैठे ज़िंदगी के कई बरस मेरी दुकान की गद्दी पर गुजर गए।
समय कब आगे बढ़ता रहा, इसका अहसास तब नहीं हुआ।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि
जीवन का बड़ा हिस्सा इसी जगह बैठकर निकल गया।

अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है जैसे ज़िंदगी के ज़्यादातर साल इसी गद्दी पर बैठकर गुज़रे हैं।

अब कई बार मन में यह ख्याल आता है कि

शायद इस दुकान को छोड़ देना चाहिए। उम्र अब उस रफ्तार की इजाज़त नहीं देती जिसके साथ कभी यह काम शुरू किया था।

शरीर जल्दी थक जाता है,और हर दिन वही मेहनत दोहराना आसान नहीं लगता।फिर भी, जैसे ही यह सोच गहराती है,मन भीतर से मना करने लगता है।


दुकान पर न जाऊँ तो बेचैनी बढ़ जाती है

दुकान पर गए बिना मन नहीं लगता।
घर की चार दीवारों में बैठता हूँ, तो खुद को कैद-सा महसूस करता हूँ।

टीवी चल रहा होता है,
लोग बात कर रहे होते हैं,
सब कुछ सामने होता है —
फिर भी भीतर कुछ अधूरा रह जाता है।

लेकिन जैसे ही दुकान की गद्दी पर बैठता हूँ,
एक अजीब-सा सुकून मिल जाता है।

चाहे कोई ग्राहक आए या नहीं,
बस वहाँ बैठ जाना ही
मन को शांत कर देता है।


अब ग्राहक संभालने की उम्र नहीं रही

यह सच है कि अब मेरी उम्र ग्राहक संभालने की नहीं रही।
पहले जैसी फुर्ती नहीं है।
लंबी बातचीत थका देती है।
बार-बार खड़े होना भारी लगता है।

अब ज़्यादातर समय
मैं बस दुकान पर बैठकर
सब कुछ देखता रहता हूँ।

लोग आते-जाते हैं।
सड़क चलती रहती है।
दुकान के बाहर ज़िंदगी चलती रहती है।

मैं उसमें हिस्सा कम लेता हूँ,
लेकिन उसे देखना
अब भी ज़रूरी लगता है।


फिर भी काम करने से मन नहीं रुकता

दुकान पर बीती उम्र अब 80 हो गई
यह बात मैं खुद भी जानता हूँ।

फिर भी
जब कोई ग्राहक कुछ माँगता है,
तो उठकर सामान देने से खुद को रोक नहीं पाता।

शरीर मना करता है,
लेकिन आदत नहीं मानती।

यह दुकान सिर्फ़ काम नहीं रही।
यह दिनचर्या बन चुकी है।
यह मेरी पहचान बन चुकी है।


दुकान: काम से ज़्यादा जुड़ाव

बहुत लोग कहते हैं —
“अब आराम कर लीजिए।”
“घर पर बैठिए।”
“इतनी उम्र में क्यों मेहनत करते हैं?”

मैं समझता हूँ उनकी बात।
लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि
दुकान मेरे लिए सिर्फ़ रोज़गार नहीं है।

यह वो जगह है
जहाँ मैं खुद को ज़िंदा महसूस करता हूँ।

यहाँ बैठकर
मैं बेकार नहीं लगता।
यहाँ बैठकर
मुझे लगता है कि
मैं अब भी किसी काम का हूँ।


शरीर और मन की अलग-अलग ज़िद

अजीब बात यह है कि
ना शरीर पूरी तरह दुकान छोड़ना चाहता है,
ना मन।

शरीर कहता है —
“कम कर दो।”
“धीरे चलो।”

मन कहता है —
“बस बैठा तो रहो।”
“देखते तो रहो।”

यही बीच की स्थिति
सबसे मुश्किल होती है।

न पूरी तरह काम छोड़ सकते हैं,
न पूरी तरह आराम कर पाते हैं।


दुकान में बैठना अब ज़िम्मेदारी नहीं, आदत है

अब दुकान में बैठना
ज़िम्मेदारी से ज़्यादा
आदत बन गया है।

सुबह उठते ही
पहला ख्याल दुकान का आता है।

क्या ताला ठीक है?
सब सामान अपनी जगह है?
आज दुकान बंद रहेगी, तो कैसा लगेगा?

इन सवालों के जवाब
मन खुद ही दे देता है —
“नहीं, दुकान जाना है।”


उम्र के साथ बदलता दुकानदार का जीवन

दुकानदार का जीवन उम्र के साथ बदलता है।
पहले जोश होता है।
फिर ज़िम्मेदारी आती है।
और आख़िर में जुड़ाव रह जाता है।

अब मैं दुकान इसलिए नहीं खोलता
कि बहुत कमाना है।
मैं इसलिए खोलता हूँ
क्योंकि बंद करना
मन को भारी लगता है।


दुकान छोड़ना कमजोरी नहीं, न छोड़ पाना भी मजबूरी नहीं

यह लिखना ज़रूरी है कि
दुकान छोड़ने का मन आना
कमज़ोरी नहीं है।

और
दुकान से जुड़े रहना
कोई ज़िद नहीं।

यह बस उस जीवन का हिस्सा है
जो इसी जगह पर बन गया।


निष्कर्ष: दुकान पर बीती उम्र

आज अगर कोई मुझसे पूछे कि
मैं दुकान क्यों नहीं छोड़ पाता,
तो मेरे पास कोई बड़ा जवाब नहीं होगा।

बस इतना कहूँगा —
क्योंकि मेरी उम्र यहीं बीती है।

और जिस जगह पर
पूरा जीवन गुज़र जाए,
उसे छोड़ना
इतना आसान नहीं होता।

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