दुकानदार का भरोसा और नकली नोट , दुकान पर बैठना सिर्फ़ सामान बेचना नहीं होता।
यह रोज़-रोज़ इंसानों से भरोसे का सौदा करना होता है।
हर आने वाला ग्राहक सिर्फ़ ग्राहक नहीं होता—
वह एक कहानी लेकर आता है,
एक नज़र,
एक व्यवहार,
और कभी-कभी…
एक धोखा भी।
आज भी लोग नकली नोट चलाने की फिराक में रहते हैं।
तकनीक आगे बढ़ गई है,
नोटों पर सुरक्षा बढ़ गई है,
लेकिन धोखा देने वाली सोच आज भी वैसी ही है।
आज दुकान पर एक लड़का आया।
सामान लिया,
₹500 का नोट दिया।
नोट हाथ में आते ही
दिल ने कहा—
“कुछ ठीक नहीं है।”
ध्यान से देखा,
छुआ,
परखा—
और समझ में आ गया
कि नोट नकली है।
मैंने उसे वही नोट वापस कर दिया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
सामान वह पहले ही ले चुका था।
मैंने हिसाब लगाया,
₹500 में से पैसे काटकर
उसे ₹170 के सामान के बदले
₹330 लौटाए।
उस समय दिमाग में बस यही था—
“झगड़ा न हो,
बात बढ़े नहीं,
शांति बनी रहे।”
लेकिन बाद में जब दोबारा जांच की,
तो पता चला कि
उसने नकली नोट तो वापस ले लिया,
लेकिन
मेरे दिए हुए ₹330 भी साथ ले गया।
वो पैसे वापस नहीं आए।
शायद आएँगे भी नहीं।
और सबसे भारी बात ये थी कि
आज जितनी कमाई हुई थी,
उससे ज़्यादा
नुकसान हो चुका था।
₹330 की बात नहीं है।
दुकानदार को नुकसान
सिर्फ़ पैसे का नहीं होता—
उसे भरोसे का नुकसान होता है।
कुछ लोग दुकान पर
सामान लेने नहीं आते,
वो
दुकानदार को बेवकूफ़ समझने आते हैं।
उन्हें लगता है
दुकानदार हर समय
लाभ-हानि में उलझा रहेगा,
ध्यान नहीं देगा,
और यहीं से
वे फायदा उठा लेंगे।
लेकिन दुकानदार भी
हर दिन
इंसान पढ़ना सीखता है।
फिर भी…
वह हर बार सख्त नहीं बन पाता।
क्योंकि अगर वह
हर ग्राहक को शक की नज़र से देखने लगे,
तो दुकान तो चल जाएगी,
लेकिन
दिल बंद हो जाएगा।
दुकानदार आँख मूँदकर भरोसा नहीं करता,
वह आँख खोलकर भी
इंसानियत चुनता है।
और कुछ लोग
उसी इंसानियत का
गलत फायदा उठा लेते हैं।
कभी-कभी दुकानदार का भरोसा टूट जाता है
और कमाई से ज़्यादा नुकसान हो जाता है।
कभी-कभी
दिन भर बैठने के बाद भी
जेब हल्की रह जाती है।
लेकिन दुकानदार
अगले दिन फिर दुकान खोलता है।
क्योंकि उसके पास
नुकसान से बड़ा
एक हौसला होता है—
ईमान से कमाने का।
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