दुकानदार की दुकान केवल सामान बेचने की जगह नहीं होती।
वह एक ऐसा ठिकाना होती है जहाँ लोग रुकते हैं,
कुछ खरीदने के लिए,
और कुछ अपने मन का बोझ हल्का करने के लिए।
इसी रुकने-बैठने में दुकानदार के किस्से और कहानियाँ अनेकों जमा हो जाती है।
लोग आते हैं, बातें छोड़ जाते हैं
दुकान पर हर दिन अलग-अलग लोग आते हैं।
कोई हँसते हुए,
कोई जल्दी में,
तो कोई बिना किसी खास वजह के।
कुछ लोग अपने घर की बातें बताते हैं,
कुछ काम-धंधे की,
और कुछ अपनी परेशानियाँ।
दुकानदार ज़्यादातर सुनता है—
बिना टोके, बिना जज किए।
सुनना भी एक कला है
दुकानदार सबका जवाब नहीं देता।
कई बार वह सिर्फ सिर हिला देता है,
कभी हल्की-सी मुस्कान दे देता है,
और कभी “हाँ” कहकर बात आगे बढ़ा देता है।
लेकिन उसके भीतर हर बात दर्ज हो जाती है।
वह जानता है कि
कभी-कभी सुन लिया जाना ही सबसे बड़ी मदद होती है।
किस्से जो रुक जाते हैं
कुछ ग्राहक ऐसे होते हैं जो रोज़ आते हैं।
धीरे-धीरे उनका चेहरा पहचान में बदल जाता है
और बातें किस्सों में।
आज बच्चों की फीस की चिंता,
कल नौकरी का डर,
परसों किसी अपने से झगड़ा—
ये सब दुकान की दीवारों में कहीं न कहीं ठहर जाता है।
दुकानदार के किस्से और अपनी कहानी
इन सबके बीच दुकानदार खुद भी एक कहानी होता है।
वह दूसरों को सुनते-सुनते
अपने जीवन के अनुभव भी जोड़ता जाता है।
उसे पता चल जाता है कि
कौन सच बोल रहा है,
कौन दिखावा कर रहा है,
और कौन भीतर से टूटा हुआ है।
यही अनुभव उसे परिपक्व बनाता है।
बिना लिखी हुई डायरी
दुकानदार के पास कोई डायरी नहीं होती
जिसमें वह ये सब लिखे।
उसकी याददाश्त ही उसकी डायरी होती है।
किस ग्राहक ने कब क्या कहा,
किस दिन कौन परेशान था—
यह सब उसके मन में सुरक्षित रहता है।
समय के साथ ये बातें
उसकी समझ और सोच का हिस्सा बन जाती हैं।
दुकान एक छोटा समाज
एक छोटी-सी दुकान
पूरे समाज की झलक दिखा देती है।
यहाँ अमीर भी आता है,
गरीब भी।
ईमानदार भी,
और चालाक भी।
दुकानदार सबको देखता है,
सबसे कुछ सीखता है,
और किसी एक जैसा नहीं बनता।
अनुभव जो बोलते नहीं
दुकानदार के अनुभव
अक्सर शब्दों में बाहर नहीं आते।
वह मंच पर भाषण नहीं देता,
किताबें नहीं लिखता।
लेकिन जब वह किसी को
दो शब्द की सलाह देता है,
तो उसमें सालों का देखा-सुना छिपा होता है।
निष्कर्ष
दुकानदार के पास जमा हुई कहानियाँ
उसकी कमाई से कहीं ज़्यादा कीमती होती हैं।
ये कहानियाँ उसे
धैर्य, समझ और इंसानियत सिखाती हैं।
वह इन किस्सों को
अपने अनुभव में बदल लेता है—
और चुपचाप
ज़िंदगी को थोड़ा बेहतर समझने लगता है।
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