दुकानदार का डर किसी एक बात से जुड़ा नहीं होता। यह डर धीरे-धीरे बनता है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है। बाहर से जो दुकानदार शांत दिखाई देता है, उसके भीतर कई तरह की चिंताएँ चल रही होती हैं। यह डर अचानक नहीं आता, बल्कि समय के साथ मन में घर कर लेता है।
दुकान चलने का डर
जैसे एक दुकानदार की सबसे बड़ी चिंता यही होता है कि कहीं दुकान चलनी बंद न हो जाए। रोज़ सुबह दुकान खोलते समय मन में यह सवाल रहता है कि आज ग्राहक आएंगे या नहीं। अगर लगातार कुछ दिन बिक्री कम रहे, तो यह डर और गहरा हो जाता है। दुकान खुली है, लेकिन मन में हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है।
खर्च पूरे न होने की चिंता
इसलिए कोई दुकानदार सिर्फ अपनी दुकान के बारे में नहीं सोचता, वह पूरे घर का हिसाब साथ लेकर चलता है। बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया, बिजली का बिल, उधार और रोज़ का खर्च—ये सभी बातें उसके डर को बढ़ाती हैं। कम कमाई वाले दिन सिर्फ जेब नहीं, मन को भी खाली कर देते हैं।
ग्राहक खो देने का डर
दुकानदार हमेशा इस डर में रहता है कि कहीं ग्राहक नाराज़ न हो जाए। इसलिए कई बार वह नुकसान सहकर भी ग्राहक को खुश रखने की कोशिश करता है। दाम कम कर देना, उधार देना या चुप रह जाना—ये सब उसी डर का हिस्सा होते हैं कि ग्राहक कहीं दूसरी दुकान न चला जाए।
बाजार और बदलते समय का डर
आज का बाजार तेज़ी से बदल रहा है। ऑनलाइन बिक्री, बड़े स्टोर और नई दुकानें—ये सब छोटे दुकानदार के मन में डर पैदा करते हैं। वह सोचता है कि क्या वह इस बदलाव के साथ चल पाएगा या धीरे-धीरे पीछे रह जाएगा। यह डर उसे नई चीज़ें करने से रोक भी देता है।
दुकान बंद होने का डर
दुकानदार का सबसे गहरी चिंता यही होता है कि अगर दुकान बंद करनी पड़ी तो क्या होगा। दुकान सिर्फ कमाई का साधन नहीं होती, बल्कि उसकी पहचान भी होती है। दुकान बंद होने का मतलब उसके लिए सिर्फ काम का खत्म होना नहीं, बल्कि सम्मान और आत्मविश्वास का टूटना भी होता है।
डर के साथ जीना
दुकानदार का डर कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। वह उसी डर के साथ रोज़ दुकान खोलता है और उसी डर के साथ दिन काटता है। फिर भी वह हार नहीं मानता, क्योंकि उसके पास रुकने का विकल्प नहीं होता। जिम्मेदारियाँ उसे रोज़ फिर से खड़ा कर देती हैं।
दुकानदार का डरना कमजोरी नहीं है।
यह उसकी ज़िम्मेदारियों और हालात की सच्चाई है,
जिसे वह रोज़ चुपचाप सहता है।
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