दुकानदार का द्वंद : जब मन दुकान में अटका रह जाता है और शरीर थक जाता है
जैसे-जैसे ज़िंदगी का पड़ाव आगे बढ़ता है, एक अजीब-सा सवाल भीतर उठने लगता है।
लगता है कि अब शायद यह दुकान छोड़ देनी चाहिए।
अब शायद कुछ और सोचना चाहिए।
अब शायद शरीर का साथ उतना नहीं रहा।
लेकिन ठीक उसी समय, मन कुछ और ही कहता है।
मन दुकान छोड़ने को तैयार नहीं होता।
शरीर थक चुका है।
अब ज़्यादा मेहनत करने का मन नहीं करता।
सुबह उठते ही वही जोश नहीं आता।
दिन भर खड़े रहना भारी लगता है।
ग्राहक से वही मुस्कान बनाकर बात करना अब आसान नहीं रहा।
फिर भी —
मन दुकान के बाहर जाता ही नहीं।
मन लगातार दुकान के भीतर ही दौड़ता रहता है।
कौन-सा सामान खत्म हो रहा है?
क्या नया लाना है?
ग्राहक आज क्या पूछ रहा था?
कल किस चीज़ की माँग ज़्यादा थी?
किस शेल्फ़ में क्या रखा है?
क्या कहीं कमी तो नहीं रह गई?
शरीर कहता है — “बस अब।”
लेकिन मन कहता है — “अभी नहीं।”
यही द्वंद्व एक दुकानदार को अंदर-ही-अंदर खा जाता है।
दुकान सिर्फ़ एक जगह नहीं रह जाती।
वह दिमाग़ की आदत बन जाती है।
सोते समय भी मन हिसाब लगाता रहता है।
सुबह उठते ही पहला ख्याल दुकान का आता है।
बीच में कहीं जाएँ, तब भी नज़रें चीज़ों पर टिक जाती हैं —
“ये सामान तो दुकान में भी चल सकता है।”
धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि
दुकान शरीर में नहीं,
दिमाग़ में चल रही है।
एक समय था जब दुकान उम्मीद थी।
कुछ बनाने की चाह थी।
कुछ अपने दम पर खड़ा करने का गर्व था।
अब दुकान जिम्मेदारी है।
छोड़ना आसान नहीं।
और निभाना भी आसान नहीं।
यही सबसे बड़ा सच है।
दुकानदार का द्वंद उसके मन में अक्सर दो हिस्सों में बँटा रहता है।
एक हिस्सा कहता है —
“अब आराम करना चाहिए।”
“अब ज़िंदगी में कुछ और होना चाहिए।”
“अब यह रोज़-रोज़ का चक्र भारी लगने लगा है।”
दूसरा हिस्सा तुरंत जवाब देता है —
“अगर दुकान छोड़ दी तो क्या करोगे?”
“जो पहचाना है, वही तो दुकान है।”
“जो आता है, वही तो यही काम है।”
और यह दूसरा हिस्सा
ज़्यादा ताकतवर होता है।
दुकानदार का डर सिर्फ़ घाटे का नहीं होता।
वह डर इस बात का होता है कि
अगर दुकान छूट गई
तो पहचान क्या बचेगी?
लोग पूछेंगे —
“अब क्या कर रहे हो?”
“दुकान क्यों छोड़ दी?”
इन सवालों से
शरीर नहीं,
मन डरता है।
कई बार ऐसा भी होता है कि
दुकान में ग्राहक कम आते हैं,
लेकिन दिमाग़ ज़्यादा थक जाता है।
क्योंकि खाली दुकान
सबसे ज़्यादा बोलती है।
खामोशी में
हर सवाल तेज़ हो जाता है।
“क्या मैं पीछे रह गया?”
“क्या मेरी मेहनत बेकार जा रही है?”
“क्या समय मुझसे आगे निकल गया?”
इन सवालों का
कोई बिल नहीं बनता,
कोई जवाब नहीं मिलता।
दुकानदार का जीवन बाहर से सीधा लगता है।
दुकान खोली।
सामान रखा।
बेचा।
घर गए।
लेकिन भीतर
हर दिन एक लड़ाई चलती है।
शरीर रुकना चाहता है।
मन दौड़ना चाहता है।
और यही थकान
सबसे ज़्यादा भारी होती है।
सबसे अजीब बात यह है कि
दुकानदार दुकान से नाराज़ भी रहता है
और उसी दुकान से जुड़ा भी रहता है।
वह चाहता है कि
कोई दिन ऐसा आए
जब उसे दुकान के बारे में न सोचना पड़े।
लेकिन अगर ऐसा दिन आ जाए,
तो उसे बेचैनी होने लगती है।
क्योंकि
दुकान सिर्फ़ काम नहीं,
उसकी आदत बन चुकी होती है।
यह लेख किसी समाधान की बात नहीं करता।
यह आपको यह नहीं कहता कि
दुकान छोड़ दीजिए
या डटे रहिए।
यह सिर्फ़ इतना कहता है कि
अगर आप यह द्वंद्व महसूस कर रहे हैं,
तो आप अकेले नहीं हैं।
बहुत से दुकानदार
इसी चुपचाप चल रही लड़ाई में जी रहे हैं।
कभी-कभी
दुकान बंद करने का ख्याल आना
कमज़ोरी नहीं होता।
और कभी-कभी
दुकान में अटके रहना
मजबूरी नहीं,
जुड़ाव होता है।
दुकानदार होना
सिर्फ़ बेचना नहीं है।
यह हर दिन
अपने मन को
किसी न किसी तरह
समझाते रहना भी है।
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