“होना क्या था” का मतलब क्या होता है?
जब कोई पूछता है —
“क्या हुआ?”
और जवाब आता है —
“होना क्या था।”
तो यह जवाब हल्का नहीं होता।
असल में, “होना क्या था” का मतलब होता है —
बहुत कुछ हुआ है,
पर अब उसे कहने की जगह नहीं बची।
“होना क्या था” में छुपी चुप्पी
यह चुप्पी साधारण नहीं होती।
यह वो चुप्पी होती है
जो समझाने से थक चुकी होती है।
जब इंसान जानता है कि
बोलने से बात सुधरेगी नहीं,
तो वह चुप रहना चुनता है।
इसी चुप्पी से निकलता है —
“होना क्या था।”
दबा हुआ गुस्सा, जो बाहर नहीं आता
“होना क्या था”
गुस्से का धमाका नहीं है,
यह गुस्से का थक जाना है।
यह गुस्सा:
लड़ना नहीं चाहता
सफ़ाई नहीं देना चाहता
खुद को और नहीं थकाना चाहता
इसलिए वह अंदर ही बैठ जाता है।
छुपा हुआ दर्द जो बाहर नहीं निकलता
अक्सर यह दर्द नया नहीं होता।
यह वही दर्द होता है
जो पहले भी आया था,
और हर बार बिना आवाज़ के सह लिया गया।
जब दर्द आदत बन जाता है,
तो इंसान शिकायत छोड़ देता है।
तब वह बस कह देता है —
“होना क्या था।”
क्या यह हिम्मत की कमी है?
नहीं।
कई बार यह जवाब
हिम्मत की कमी नहीं,
बल्कि भावनात्मक थकान का संकेत होता है।
हर बार लड़ना ताक़त नहीं।
कभी-कभी चुप रहना
खुद को बचाने का तरीका होता है।

जब शब्द हार जाते हैं, आँसू बोलते हैं
जब जुबान साथ छोड़ देती है,
तो आँसू आगे आ जाते हैं।
आँसू:
बहस नहीं करते
जवाब नहीं माँगते
सफ़ाई नहीं देते
वे बस यह बताते हैं
कि अंदर बहुत कुछ है
जो कहा नहीं जा सका।
असल में
“होना क्या था” का मतलब
सिर्फ़ शब्दों में नहीं है।
यह उस हालत का नाम है
जहाँ इंसान सामने वाले को देखता है,
पर उसे सुरक्षित महसूस नहीं करता।
इसलिए बात
वाक्य बनकर नहीं,
चुप्पी बनकर बाहर आती है।
आख़िरी बात
कुछ बातें कही नहीं जातीं,
बस सह ली जाती हैं।
और जब कोई फिर पूछता है —
“क्या हुआ?”
तो जवाब बनकर निकलता है।
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