भारत में ट्रैफिक की समस्या कभी खत्म होगी? एक सवाल जो पूरे देश को परेशान करता है।
भारत में ट्रैफिक एक ऐसी समस्या बन चुकी है जो सिर्फ़ शहरों की सड़कों पर नहीं, लोगों के दिमाग पर भी बोझ बनकर बैठी है। रोज़ का जाम, बसों में गुसा हुआ सफर, हॉर्न का शोर, सड़क के बीच रुके वाहन—ये सब जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है।
लेकिन असली बात यह है कि हम इस समस्या के साथ जीना तो शुरू कर देते हैं, पर इसके पीछे के कारणों पर सवाल नहीं करते।
ना प्रशासन से पूछते हैं,
ना सिस्टम से,
ना उन लोगों से जो सड़क पर अनावश्यक तरीके से वाहन खड़ा कर देते हैं।
ट्रैफिक सिर्फ़ वाहनों की भीड़ नहीं—यह प्रबंधन की कमी है
जहाँ बैटरी रिक्शा खड़ा है—वह क्यों खड़ा है?
वहाँ पार्किंग क्यों नहीं है?
सड़क इतनी संकरी क्यों है?
वाहन एक लाइन में क्यों नहीं चल पा रहे?
ट्रैफिक पुलिस कंट्रोल क्यों नहीं कर पा रही?
ये वे सवाल हैं जो कोई नहीं पूछता।
दुख की बात यह है कि जब चालान काटने की बात होती है, ट्रैफिक पुलिस अचानक सक्रिय दिखती है। पर जब सड़क पर जाम हटाने की जरूरत होती है, तब वही व्यवस्था गायब हो जाती है।
यह समस्या सिर्फ़ दिल्ली की नहीं—यह पूरे देश की कहानी है।
जनता संघर्ष करती है, सिस्टम जवाब नहीं देता
भारत का आम नागरिक ट्रैफिक, प्रदूषण, गड्ढेदार सड़कों, अव्यवस्थित बिजली तारों और कूड़े के ढेरों के बीच हर दिन जूझ रहा है।
उसे सुविधाएँ कम और परेशानियाँ ज़्यादा मिल रही हैं।
बड़े-बड़े वादों और विज्ञापनों के बीच, वास्तविक ज़िंदगी में जनता को राहत नहीं दिखती।
लोग सुधार की उम्मीद रखते हैं, पर व्यवस्था बदलने की रफ्तार बेहद धीमी है।
ट्रैफिक सिर्फ एक समस्या नहीं—यह हमारे शहरों की योजना, प्रशासनिक क्षमता और नागरिक प्रबंधन का आईना है।
आखिर कब मिलेगा सामान्य जीवन?
सवाल यह नहीं कि ट्रैफिक कब खत्म होगा।
सवाल यह है कि हम
कब एक ऐसी व्यवस्था बनाएँगे जो सड़क को सड़क और जीवन को जीवन बनने दे।
क्योंकि आज का यह संघर्ष—
हर नागरिक को चुपचाप जीने पर मजबूर कर रहा है।
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