जब दुकानदार खाली बैठा हो , तब उसकी दुकान से ज़्यादा उसका मन खुला रहता है। ग्राहक नहीं होते, आवाज़ें नहीं होतीं, सौदेबाज़ी का शोर नहीं होता—बस एक लंबा सन्नाटा होता है। उसी सन्नाटे में मन के भीतर कई प्रश्न उठने लगते हैं।
आज ग्राहक क्यों नहीं आए?
क्या मेरी दुकान सही जगह पर है?
क्या दाम ज़्यादा हैं या समय बदल गया है?
क्या यह काम आगे भी चलेगा या कुछ और सोचना चाहिए?
जब दुकानदार खाली बैठा होता है, तब उसकी दुकान से ज़्यादा उसका मन खुला रहता है। बाहर से देखने पर लगता है कि वह बस समय काट रहा है, लेकिन भीतर बहुत कुछ चल रहा होता है। ग्राहक नहीं होते, आवाज़ें नहीं होतीं, सौदेबाज़ी का शोर नहीं होता—
खाली बैठना दुकानदार के लिए आराम नहीं होता, बल्कि यह सबसे भारी समय होता है। हाथ खाली होते हैं, लेकिन दिमाग़ लगातार हिसाब लगाता रहता है। किराया, उधारी, बिजली का बिल, बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च—
ये सब सवाल एक-एक करके मन में उतर आते हैं। कई बार वह खुद को ही समझाता है कि “आज नहीं तो कल ग्राहक आएँगे।”
इसी खाली समय में दुकानदार अपने बीते दिनों को भी याद करता है। जब दुकान पर भीड़ हुआ करती थी, जब दिन कैसे निकल जाता था पता ही नहीं चलता था। फिर मन अपने आप वर्तमान से तुलना करने लगता है। यही तुलना कभी डर बन जाती है, तो कभी सीख।कभी-कभी इसी सोच के बीच कोई नया विचार भी जन्म लेता है—
दुकान में कुछ नया रखने का, दाम बदलने का या काम करने का तरीका सुधारने का। खाली बैठा दुकानदार धीरे-धीरे अपने अनुभवों को समझ में बदलता है। यही समय उसे सिखाता है कि व्यापार सिर्फ बिक्री नहीं, धैर्य भी है।
असल में दुकानदार का खाली बैठना कभी खाली नहीं होता। यह वह समय होता है जहाँ मन टूटता भी है और खुद को जोड़ता भी है। हर सवाल के साथ एक उम्मीद भी चलती है—कि अगला ग्राहक आएगा, दुकान फिर से चलेगी, और यह सन्नाटा ज्यादा देर नहीं रहेगा।
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