कभी कभी दुकान खोलने का मन ही नहीं करता लेकिन फिर दुकान तो खोलनी ही है।

कभी–कभी दुकान खोलने का मन नहीं करता।
मन कहता है — आज मत जाओ।
आज बैठकर खाली इंतज़ार मत करो।

लेकिन जाना तो पड़ता है।
क्योंकि अगर दुकान नहीं खोलेंगे,
तो पैसे कैसे आएँगे?
और अगर पैसे नहीं आएँगे,
तो घर के खर्चे कैसे पूरे होंगे?

यही ख्याल
मन को सबसे ज़्यादा तोड़ देता है।

फिर चाहे दुकान खोलने का मन हो या न हो,
दुकान की चाबी उठानी ही पड़ती है।
शटर खोलना ही पड़ता है।
और दुकान खोलकर
बैठना ही पड़ता है।

ग्राहक आए या न आए —
बैठना पड़ता है।

और जब ग्राहक नहीं होता,
तो सिर्फ दुकान ही नहीं खुली रहती,
दुकानदार का मन भी
खुला हुआ इंतज़ार करता रहता है।

यह इंतज़ार
कोई नहीं देखता,
लेकिन यही इंतज़ार
दुकानदार की असली कमाई है।

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