कुछ दिन मैं चलता तो रहता हूं, पर क्यों बार बार रुक जाता हूं? एक अंतहीन संघर्ष

कुछ दिन ऐसे होते हैं जब मैं पूरे मन से काम करता हूँ।
मन में स्पष्टता होती है, ऊर्जा बह रही होती है, और लगता है जैसे रास्ता साफ़ दिखाई दे रहा हो।
काम में आनंद आता है, समय का पता ही नहीं चलता, और भीतर कहीं यह विश्वास भी जागता है कि इस बार सफ़र पूरा होगा।

लेकिन फिर…
अचानक सब बदल जाता है।

काम में मन नहीं लगता।
वही काम, वही लक्ष्य, वही परिस्थितियाँ—
पर भीतर कुछ ठहर सा जाता है।
कभी आलस मुझे घेर लेता है,
तो कभी मन में यह शंका उठने लगती है कि शायद मेरी कुंडली में ही ऐसा कोई योग है
जो हर बार मुझे मंज़िल के करीब लाकर रोक देता है।

क्या यह ग्रहों की चाल है या मन का बोझ?

कभी-कभी लगता है जैसे जीवन मेरे सामने बार-बार वही पैटर्न दोहरा रहा हो।
सफ़र शुरू होता है, गति बनती है, उम्मीदें जगती हैं—
और फिर अचानक सब धीमा पड़ जाता है।
मंज़िल पास दिखती है, लेकिन हाथ नहीं आती।

तभी मन पूछता है—
क्या यह सब ग्रहों की चाल है?
क्या सच में कोई ऐसी शक्ति है जो रास्ते में अड़चन बनकर खड़ी हो जाती है?

या फिर यह केवल मेरी मानसिक थकान है,
जिसे मैं आलस या भाग्य का नाम दे देता हूँ?

जब संघर्ष खत्म होने का नाम नहीं लेता

जीवन में ऐसा दौर भी आता है जब लगता है कि संघर्ष कभी समाप्त ही नहीं होगा।
एक मुश्किल खत्म होती है, तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है।
कभी आर्थिक दबाव,
कभी मानसिक उलझन,
कभी भविष्य की चिंता।

इन सबके बीच यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि
क्या करूँ और क्या न करूँ।
रास्ते धुंधले पड़ जाते हैं,
निर्णय भारी लगने लगते हैं,
और भीतर का आत्मविश्वास चुपचाप थक जाता है।

फिर भी हार क्यों नहीं मानता?

इन सबके बावजूद एक बात है जो मुझे आज भी आगे बढ़ने से रोक नहीं पाती—
हार मान लेने का विचार।

भले ही मैं रुक जाता हूँ,
भले ही गति धीमी हो जाती है,
लेकिन मैं पूरी तरह ठहरता नहीं हूँ।

क्योंकि कहीं न कहीं भीतर यह विश्वास अब भी ज़िंदा है
कि अगर मैं चलता रहूँगा,
तो एक दिन यह सफ़र पूरा होगा।

शायद मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता सीधा नहीं है।
शायद मेरे लिए रुक-रुक कर चलना ही लिखा है।
लेकिन चलना—
यह मैंने छोड़ना नहीं सीखा।

शायद यही मेरा स्वभाव है

अब धीरे-धीरे यह समझ आने लगा है कि
हर इंसान का संघर्ष एक-सा नहीं होता।
कुछ लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं,
तो कुछ लोग ठहर-ठहर कर।

शायद मेरा रास्ता भी ऐसा ही है—
जहाँ रुकना कमजोरी नहीं,
बल्कि अगली चाल की तैयारी है।

और यही सोच मुझे फिर से खड़ा कर देती है।

🧾 अंतिम शब्द

अगर आप भी कभी अपने आप कुछ दिन वाली स्थिति में पाते हैं—
जहाँ मेहनत के बाद भी ठहराव आ जाता है,
जहाँ मन सवाल करता है,
जहाँ संघर्ष थकाने लगता है—

तो याद रखिए,
रुक जाना हार नहीं है।
हार तब होती है, जब हम आगे बढ़ना छोड़ देते हैं।

और जब तक आप चल रहे हैं—
भले ही धीरे,
भले ही रुक-रुक कर—
तब तक सफ़र ज़िंदा है।

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