मुस्कुराहट से दुकान की सेल बढ़ती है, मेरी दुकान की सबसे बड़ी पूँजी मैंने कल ही इस बात पर सोचा था कि हमारा मूड बार-बार बदलता रहता है।
कई बार तो हमें खुद भी नहीं पता होता कि ऐसा क्यों हो रहा है।
बस यूँ ही—
कभी चेहरे पर गंभीरता छा जाती है,
तो कभी बिना किसी वजह के हँसी आ जाती है।
जब मैं दुकान पर बैठा होता हूँ और चेहरा गंभीर होता है,
तो सामने आने वाला ग्राहक भी उसे महसूस कर लेता है।
वह मुस्कुराने में संकोच करता है,
कोई अतिरिक्त बात पूछने से कतराता है,
और कई बार जल्दी-जल्दी देखकर चला जाता है।
लेकिन यही दृश्य
एक मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ बिल्कुल बदल जाता है।
जब मैं मुस्कुराकर बात करता हूँ—
तो ग्राहक भी सहज हो जाता है।
उसे लगता है कि यहाँ बात की जा सकती है,
यहाँ सवाल पूछे जा सकते हैं,
यहाँ उसे अपनापन मिलेगा।
अक्सर ऐसा होता है कि
जो ग्राहक कुछ लेने के इरादे से नहीं आया होता,
वह भी
कुछ न कुछ लेकर जरूर चला जाता है।
धीरे-धीरे मैंने समझा कि—
यह मुस्कुराहट मेरी दुकान की सेल बढ़ा देती है।
यही मुस्कुराहट से दुकान है चलती
मेरे पुराने ग्राहकों को आज तक मेरे पास लौटाकर लाती है।
यही मुस्कुराहट
भरोसे में बदलती है।
और यही मुस्कुराहट
असल में व्यवहार कहलाती है।
दुकान में रखे सामान से पहले
अगर कुछ बिकता है
तो वह है —
चेहरे का भाव।
और मैंने यह मान लिया है कि
मेरी दुकान की सबसे बड़ी पूँजी
ना तो शेल्फ़ पर रखी चीज़ें हैं,
ना ही दाम की सूची—
मुस्कुराहट वो जादू है जिससे दुकान की सेल और व्यापार में वृद्धि दिन दुगनी और रात चौगुनी कर देती है, और यदि कोई बैठ जाए मुंह सड़ाकर तो उसका व्यापार भी गिर जाता है।
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