हमारे बड़ों का आशीर्वाद हम पर सदा बना रहे , हमारे बड़े बुजुर्गों की दुआएं

हमारे बड़ों का आशीर्वाद आज मैं पिता जी को अस्पताल दिखाने के लिए गया था। पिछले कुछ समय से उनके गले में एक छोटी सी गांठ थी। सभी जांचें और टेस्ट पूरे हो चुके थे, बस आज ऑपरेशन की तारीख मिलनी थी। हम सुबह अस्पताल पहुंचे और डॉक्टर साहिबा को अपनी फाइल दिखाई। उन्होंने हमारे कागज़ अपने पास रख लिए और कहा कि थोड़ी देर बाहर बैठकर इंतजार कीजिए, मैं तारीख देखकर बताती हूं।

हम बाहर वेटिंग एरिया में बैठ गए। वहीं एक अम्मा जी भी बैठी हुई थीं। उन्हें देखकर साफ पता चल रहा था कि वह बहुत दर्द में थीं। उनसे ठीक से बैठा भी नहीं जा रहा था। बार-बार ऐसा लग रहा था कि वह लेटना चाहती हैं, लेकिन उनके साथ आया हुआ व्यक्ति शायद चाय-पानी लेने नीचे गया हुआ था। वह अकेली थीं और काफी परेशान दिखाई दे रही थीं।

तभी वहां एक महिला गार्ड आई और उन्हें संभालने की कोशिश करने लगी। अम्मा जी से अकेले उठा नहीं जा रहा था, इसलिए मैं भी उनकी मदद के लिए आगे बढ़ गया। किसी तरह उन्हें सहारा देकर बैठाया, लेकिन उनकी तकलीफ कम नहीं हो रही थी। दर्द उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।

गार्ड महिला ने सोचा कि उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। वह उन्हें लेकर अंदर जाने लगी तो मैं भी साथ चला गया। हमने मिलकर उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाया। उस समय अम्मा जी ने मेरा हाथ बहुत जोर से पकड़ रखा था। उनकी आंखों में दर्द भी था और अपनापन भी।

स्ट्रेचर पर लेटते ही उन्होंने मुझे ढेर सारी दुआएं देनी शुरू कर दीं। उन्होंने कहा, “भगवान ऐसे बच्चे सबको दे, भगवान अपनी कृपा बनाए रखे, खुश रहो, तरक्की करो।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “अम्मा, दुआएं मत दीजिए, बस आप ठीक हो जाइए और स्वस्थ रहिए।”
कुछ देर बाद मैं बाहर आ गया।

थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहिबा ने हमें भी अंदर बुलाया। उन्होंने कहा कि एक बार सीनियर डॉक्टर को भी दिखा लेते हैं। सीनियर डॉक्टर ने पिता जी के गले को बहुत ध्यान से जांचा। उन्होंने कुछ मिनट तक पूरी तरह से निरीक्षण किया और फिर आश्चर्य से कहा, “गांठ तो अब दिखाई नहीं दे रही।”
डॉक्टर ने समझाया कि कई बार ऐसी गांठें अपने आप घुल जाती हैं और ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती।

डॉक्टर की बात अपनी जगह सही थी। विज्ञान के पास उसके कारण होंगे। लेकिन उस क्षण मेरे मन में सबसे पहले उन अम्मा जी का चेहरा आया। उनकी आंखें, उनका दर्द और उनके मुंह से निकली हुई दुआएं याद आ गईं।

मुझे ऐसा लगा जैसे उन दुआओं का असर तुरंत दिखाई दे गया हो।
हो सकता है यह केवल एक संयोग हो, लेकिन जीवन में कुछ संयोग इतने सुंदर होते हैं कि उन्हें केवल संयोग कहने का मन नहीं करता। बड़े-बुजुर्गों की दुआओं में एक अलग ही शक्ति होती है। उन्होंने जीवन को हमसे अधिक देखा है, अधिक जिया है और अधिक सहा है। शायद इसलिए उनके हृदय से निकली हुई शुभकामनाएं सीधे ईश्वर तक पहुंच जाती हैं।

आज अस्पताल से लौटते समय मन में बार-बार यही विचार आ रहा था कि हमारे बड़ों का आशीर्वाद हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। धन, संपत्ति और सफलता बाद की बातें हैं, लेकिन जिनके सिर पर बड़ों का हाथ हो, उनके जीवन में आशा हमेशा बनी रहती है।

ईश्वर करे, हम सब पर अपने बड़ों का आशीर्वाद और स्नेह हमेशा बना रहे।

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