जब शब्द खामोश हो जाएँ : भीतर की शांति और चुप्पी का अर्थ खोज नहीं पाए

भीतर उस खामोशी को शायद
अब जगह मिल गई है,
इसीलिए शब्दों का
बाहर आना
थोड़ा मुश्किल हो गया है।

ऐसा नहीं है
कि शब्द मुझसे दूर हो गए हैं।
न ही उन्होंने
मुझसे कोई नाराज़गी पाल ली है।
वे बस
भीतर ही
खामोश बैठ गए हैं।

शब्दों का यह चुप रहना
कोई रूठना नहीं,
बल्कि
एक ठहराव है।
एक ऐसा ठहराव
जहाँ वे भी
आराम करना चाहते हैं।

शायद
अब उन्हें बोलने से पहले
कुछ देर
सुनना ज़रूरी लग रहा है।
भीतर की उस शांति को,
जो बिना कहे
बहुत कुछ कह देती है।

जब शब्द
फिर लौटेंगे,
तो शायद
शोर नहीं होंगे।
वे धीरे आएँगे,
हल्के होंगे,
और पहले से
ज़्यादा सच्चे होंगे।

तब तक
इस खामोशी के साथ
बैठे रहना ही
काफी है।

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