सुबह जल्दी उठने से मेरी जिंदगी कैसे बदलने लगी | समय की साईकिल बदलने का अनुभव

जब मैंने अपनी समय की साईकिल बदल दी

जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम किसी गलत रास्ते पर नहीं होते, लेकिन एक ऐसे चक्र में फँस जाते हैं जो धीरे-धीरे हमें हमारे लक्ष्य से दूर ले जाने लगता है। यह चक्र हमारी आदतों का होता है।

यदि हम उस चक्र को पहचान लें और उसे तोड़ने का साहस कर लें, तो जीवन में बहुत कुछ बदल सकता है।

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

मैं कई वर्षों से रात के समय लिखने की कोशिश करता था। हर रात यही सोचता कि आज अच्छी तरह लिखूँगा। लेकिन रात होते-होते कुछ न कुछ बदल जाता था। कभी जल्दी सोने का मन करता, कभी कोई फिल्म देखने बैठ जाता, कभी क्रिकेट का मैच शुरू हो जाता। सोचता था कि सब करते हुए लिख भी लूँगा, लेकिन ऐसा शायद ही कभी हो पाता।

कई रातें ऐसी बीतीं जब केवल कुछ पंक्तियाँ लिखीं और फिर सो गया।

धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि मैं लिख तो रहा हूँ, लेकिन अपने लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ रहा।

सबसे कठिन समय वह होता है जब इंसान स्वयं पर ही संदेह करने लगे।

मेरे साथ भी यही होने लगा। जिस सपने के लिए मैंने अपना सुरक्षित रास्ता छोड़ा था, वही सपना मुझसे दूर होता दिखाई देने लगा। परिणाम नहीं दिख रहे थे, इसलिए मन भी धीरे-धीरे हार मानने लगा।

फिर मैंने केवल एक बदलाव किया वो है समय की साईकिल

मैंने रात की जगह सुबह को चुन लिया।

आज मुझे लगातार सुबह जल्दी उठते हुए ग्यारह दिन हो चुके हैं। शुरुआत आसान नहीं थी। हर सुबह आलस आता था, नींद बार-बार अपनी ओर खींचती थी। कई बार आँखें बंद करते ही लगता था कि फिर सो जाऊँ।

लेकिन मैंने एक नियम बना लिया—

चाहे अच्छा लिखूँ या नहीं, मुझे अपने समय पर बैठना है।

धीरे-धीरे शरीर ने इस नई आदत को स्वीकार करना शुरू कर दिया।

आज पहली बार ऐसा लगा कि न तो नींद परेशान कर रही है और न ही आलस।

शायद आदतें भी समय माँगती हैं।

सुबह लिखते हुए मैंने एक और अंतर महसूस किया।

रात में हर दो-चार पंक्तियों के बाद विचार रुक जाते थे। शब्द जैसे भीतर कहीं अटक जाते थे। लेकिन सुबह ऐसा नहीं होता। विचार धीरे-धीरे आते हैं, लेकिन लगातार आते हैं। उनके बीच कोई शोर नहीं होता। इसलिए उन्हें पकड़ना और शब्द देना आसान हो जाता है।

मुझे अब यह भी समझ आने लगा है कि केवल समय बदलने से ही नहीं, पूरे दिन की दिशा बदल जाती है।

पहले दिन की शुरुआत देर से होती थी। फिर घर के छोटे-बड़े काम, फोन, जिम्मेदारियाँ और दूसरी व्यस्तताएँ पूरे दिन को अपने कब्ज़े में ले लेती थीं। शाम तक ऐसा लगता था कि पूरा दिन बीत गया, लेकिन अपने सपने के लिए कुछ भी नहीं कर पाया।

अब स्थिति अलग है।

सुबह के पहले दो या तीन घंटे मैं अपने सबसे प्रिय काम को देता हूँ।

इसके बाद दिन में चाहे दुकान हो, परिवार हो या दूसरे काम—मन उनके प्रति भी हल्का रहता है। क्योंकि दिन की शुरुआत मैं अपने सपने के साथ कर चुका होता हूँ।

मुझे लगता है कि बहुत-से लोग भी इसी समय के चक्र में फँसे हुए हैं।

वे अपने काम से नहीं, बल्कि अपनी दिनचर्या से हार रहे हैं।

यदि आप रात को किताब पढ़ते हैं, तो संभव है कुछ पन्नों के बाद ही नींद आ जाए। लेकिन वही किताब यदि सुबह पढ़ी जाए, तो शायद दो या तीन घंटे पूरे ध्यान से पढ़ी जा सकती है।

एक छोटा-सा बदलाव पूरे वर्ष का परिणाम बदल सकता है।

इसी तरह लेखन, पढ़ाई, व्यायाम या कोई भी सपना—उसे दिन के बचे हुए समय पर मत छोड़िए।

उसे दिन की शुरुआत दीजिए।

मुझे अब सफलता की उतनी चिंता नहीं है जितनी पहले हुआ करती थी।

अब मेरी सबसे बड़ी इच्छा केवल यह है कि मेरे भीतर लिखने का जुनून कभी खत्म न हो।

पैसा कमाने के रास्ते बहुत हो सकते हैं, लेकिन यदि लिखना ही छूट गया, तो मेरे भीतर का एक हिस्सा हमेशा अधूरा रह जाएगा।

इसलिए मैंने केवल अपनी घड़ी नहीं बदली है।

मैंने अपने जीवन की दिशा बदलने की शुरुआत की है।

कभी-कभी जीवन बदलने के लिए किसी बड़े फैसले की ज़रूरत नहीं होती।

केवल इतना पर्याप्त होता है कि आप अपने सपनों को रात की थकान से निकालकर सुबह की ताज़गी में ले आएँ और वही मैने किया समय की साईकिल

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