विचारों की रचना कौन करता है | क्या हम विचार बनाते है या वे स्वयं जन्म लेते है ?

विचारों की रचना कौन करता है?

मैंने अब यह तय कर लिया है कि मुझे हर रोज़ केवल लिखना है। मैं अच्छा लिख पा रहा हूँ या नहीं, अब इसकी चिंता नहीं करता। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं हर सुबह साढ़े चार बजे उठकर बैठूँ, अपने भीतर उठते विचारों को देखूँ और उन्हें शब्दों में उतार दूँ।

धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा है कि नियमित बैठना, अच्छा लिखने से अधिक महत्वपूर्ण है।

सुबह का समय मुझे इसलिए प्रिय है क्योंकि इस समय विचारों में कोई शोर नहीं होता। वे एक-एक करके आते हैं। उन्हें आते हुए देखना, समझना और उनके साथ कुछ देर तक ठहरना आसान होता है। जैसे-जैसे सूरज ऊपर चढ़ता है, विचारों की गति भी बढ़ने लगती है।

दिन भर की घटनाएँ, बातचीत, काम और जिम्मेदारियाँ मन को इतना व्यस्त कर देती हैं कि विचारों को उनकी मूल अवस्था में देख पाना कठिन हो जाता है।

विचारों का आना-जाना कभी रुकता नहीं।

कभी वे तेज़ बहती नदी की तरह आते हैं, तो कभी बहुत धीमे। कभी उन्हें पकड़ना आसान होता है, तो कभी वे आँखों के सामने से गुजर जाते हैं और हम उन्हें पहचान भी नहीं पाते।

लेकिन इन सबके बीच एक प्रश्न बार-बार मेरे भीतर उठता है।

विचारों की रचना कौन करता है?

क्या मैं स्वयं अपने विचारों का निर्माता हूँ?

या फिर विचार पहले से ही मेरे भीतर मौजूद रहते हैं और केवल उचित समय आने पर सामने आते हैं?

जब मुझे किसी विशेष शब्द या विचार की आवश्यकता होती है, तभी वही विचार क्यों उभरता है? क्या यह संयोग है, या भीतर कोई ऐसी प्रक्रिया लगातार चल रही है जिसके बारे में मुझे बहुत कम जानकारी है?

कई बार ऐसा लगता है कि बुद्धि केवल ऊपर दिखाई देने वाली सतह है। उसके नीचे कुछ और भी है, जहाँ विचार बनते हैं, जुड़ते हैं, टूटते हैं और फिर नया रूप लेकर वापस आते हैं।

हम अपने विचारों को देख सकते हैं, लेकिन क्या हमने कभी विचारों को बनते हुए देखा है?

शायद नहीं।

हम परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं।

यही बात भावनाओं और एहसासों के साथ भी है। किसी विचार के पीछे कौन-सी भावना काम कर रही है, यह समझना अक्सर स्वयं विचार को समझने से भी कठिन होता है। हो सकता है कि विचार केवल शब्द हों और उनकी वास्तविक ऊर्जा भावनाओं और अनुभवों से आती हो।

धीरे-धीरे मुझे यह भी महसूस होने लगा है कि किसी बड़े सपने को पूरा करने के लिए एक बड़े विचार की आवश्यकता नहीं होती।

उसके लिए सैकड़ों छोटे-छोटे विचारों को एक दिशा में जोड़ना पड़ता है।

एक शब्द, एक वाक्य या एक उद्देश्य यदि हमारे जीवन का केंद्र बन जाए, तो धीरे-धीरे हमारे अनेक विचार उसी के आसपास व्यवस्थित होने लगते हैं। शायद यही कारण है कि जिन लोगों का लक्ष्य स्पष्ट होता है, उनके निर्णय भी अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं।

कभी-कभी अधूरे विचार भी वर्षों तक हमारे भीतर शांत पड़े रहते हैं। वे समाप्त नहीं होते, केवल प्रतीक्षा करते हैं। जब उन्हें सही परिस्थिति, सही अनुभव या सही शब्द मिल जाता है, तो वे फिर से जीवित हो उठते हैं।

शब्द भी मुझे किसी चाबी की तरह लगते हैं।

कभी कोई एक शब्द वर्षों से बंद पड़े किसी अनुभव का दरवाज़ा खोल देता है। तब लगता है कि शब्द केवल भाषा नहीं हैं, वे भीतर छिपी हुई स्मृतियों, भावनाओं और अर्थों तक पहुँचने का माध्यम भी हैं।

शायद हर शब्द अपनी किसी चाबी की तलाश में होता है, और हर अनुभव अपने किसी शब्द की।

जब दोनों का मिलन होता है, तभी एक नया विचार जन्म लेता है।

इसीलिए अब मैं हर सुबह किसी महान विचार की प्रतीक्षा नहीं करता।

मैं केवल बैठता हूँ।

देखता हूँ।

सुनता हूँ।

और अपने भीतर चल रही उस अदृश्य प्रक्रिया का साक्षी बनने की कोशिश करता हूँ जहाँ शायद विचार जन्म लेते हैं।

शायद लेखक का काम विचारों को बनाना नहीं, बल्कि उनके जन्म का साक्षी बनना है।

यह भी पढ़ें : नया विचार , विचारों का पिटारा , सबसे अच्छा विचार , मन के विचार , विचार क्या है ,


Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *