जब सुबह कोई विचार ही न आए आज सुबह भी मैं लिखने के लिए समय पर बैठ गया हूँ। लगातार सात दिनों से मैं सुबह जल्दी उठ रहा हूँ। पहले उठने में थोड़ा आलस आता था, लेकिन अब महसूस हो रहा है कि जैसे-जैसे यह आदत बन रही है, शरीर भी उसे स्वीकार करने लगा है। मुझे विश्वास है कि कुछ दिनों बाद उठना भी उतना ही सहज हो जाएगा जितना अब लिखने के लिए बैठना।
लेकिन आज एक अलग बात हुई।
मैं लिखने तो बैठ गया, पर कोई नया विचार दिखाई नहीं दे रहा था। मन जैसे किसी अनजानी उलझन में था। कभी पुरानी यादों की ओर चला जाता, तो कभी बिल्कुल खाली हो जाता। मैं सोच रहा था कि आखिर आज लिखूँ क्या?
फिर मन में एक प्रश्न उठा।
क्या सचमुच आज कोई विचार नहीं है, या मैं उसे देख नहीं पा रहा हूँ?
कभी-कभी लगता है कि विचार कहीं बाहर से आते हैं। फिर लगता है कि वे पहले से ही हमारे भीतर मौजूद रहते हैं। यदि वे पहले से हैं, तो कुछ दिनों तक दिखाई क्यों नहीं देते? और यदि वे बनते हैं, तो उनका जन्म कैसे होता है?
शायद इन प्रश्नों का उत्तर तुरंत नहीं मिलेगा। लेकिन इतना अवश्य समझ आया कि विचारों का न आना भी अपने आप में एक अनुभव है। उसे भी उतनी ही ईमानदारी से देखा जा सकता है जितनी किसी महान विचार को।
सुबह के समय मैं अक्सर विचारों का इंतज़ार करता हूँ। कई बार वे देर से आते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जिन विचारों के लिए सुबह घंटों बैठना पड़ता है, वही विचार दिन या शाम को बिना बुलाए चले आते हैं। विचारों का अपना स्वभाव होता है। वे हमारी इच्छा से नहीं, अपनी गति से आते हैं।
आज मुझसे एक छोटी-सी गलती भी हुई।
मैंने लिखने से पहले मोबाइल खोल लिया। कुछ ही क्षणों में नोटिफिकेशन आने लगे। कभी इंस्टाग्राम, कभी व्हाट्सऐप। मेरा ध्यान उसी ओर चला गया। जब दोबारा लिखने बैठा तो महसूस हुआ कि भीतर जो शांति थी, वह टूट चुकी है।
तब समझ आया कि सुबह का पहला निर्णय पूरे दिन के लेखन को प्रभावित कर सकता है।
मोबाइल देखने के लिए पूरा दिन पड़ा है, लेकिन अपने विचारों से मिलने का यह समय केवल कुछ घंटों का होता है। यदि वही समय बिखर जाए, तो फिर विचारों को वापस बुलाना आसान नहीं होता।
आज एक और बात स्पष्ट हुई।
लिखना केवल शब्द लिखना नहीं है, यह ध्यान की एक प्रक्रिया है।
जिस प्रकार ध्यान में हम अपने भीतर उठती हर हलचल को बिना जल्दबाज़ी के देखते हैं, उसी प्रकार लेखन में भी हर विचार को धैर्य से देखना पड़ता है। कुछ विचार स्पष्ट होते हैं, कुछ अधूरे होते हैं, और कुछ इतने छोटे कि पहली नज़र में दिखाई भी नहीं देते। लेखक का काम केवल उन्हें पकड़ना नहीं, बल्कि उन्हें पूरा होने का अवसर देना भी है।
कई बार मन बार-बार भटकता है। उसे बार-बार वापस बुलाना पड़ता है। क्योंकि जब तक मन नहीं ठहरता, विचार भी नहीं ठहरते। जब सुबह कोई विचार ही न आए
आज शरीर पहले की तुलना में अधिक हल्का महसूस हो रहा था। नींद भी कम आ रही थी। सुबह की थोड़ी-सी स्ट्रेचिंग और कुछ छोटे-छोटे अभ्यासों ने शरीर को जगाने में मदद की। तब महसूस हुआ कि जागा हुआ शरीर, जागे हुए विचारों की भी सहायता करता है।
हर दिन लिखने के बाद मुझे लगता है कि मैं अभी भी उतनी गहराई से नहीं लिख पा रहा जितना लिखना चाहता हूँ। लेकिन शायद गहराई किसी एक सुबह का परिणाम नहीं होती।
वह धीरे-धीरे बनती है।
जिस प्रकार एक आदत रोज़ थोड़ा-थोड़ा बनती है, उसी प्रकार लेखन भी हर सुबह थोड़ा-थोड़ा परिपक्व होता है। इसलिए अब मेरा उद्देश्य किसी महान विचार की प्रतीक्षा करना नहीं है।
मेरा उद्देश्य केवल हर सुबह समय पर बैठना है।
क्योंकि मैंने समझ लिया है कि लेखक महान विचारों से नहीं बनता, बल्कि उस अनुशासन से बनता है जिसमें वह उन दिनों में भी लिखने बैठता है, जब उसके पास लिखने के लिए कुछ भी नहीं होता।
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