ishq bhar ki baato mei kuch baat adhuri naa reh jaaye
Read MoreBlog
इश्क हुआ था
इश्क हुआ था अब ये बात बताऊ कैसे
इस दर्द को छिपाऊ कैसे
क्या खूब लिख बैठे हो जिंदगी को अब यह बात बताऊ कैसे ? गम ए जिंदगी का हाल अब सुनाऊ कैसे
इश्क हुआ था जनाब, इश्क हुआ था
उसका दर्द कितना है, यह समझाऊ कैसे? दिखाऊ कैसे ?
बड़े अफ़साने हुये, बड़े फ़साने हुए
जिंदगी की जिंदगी से मुलाकात हुई,
जाम से जाम टकरा अब वो पैमाने हुए।
यह भी पढे: छोटी कविता, इश्क की कहानी, इश्क भर की बातों में, इश्क की बाते, दर्द का दिखावा,
समस्या को सुलझाना
उलझिए नहीं क्युकी सुलझना जीवन का बेहतर विकल्प है। जीवन की हर छोटी बड़ी परेशानी में खुद को खो मत देना बस उन्हे सुलझाते हुए हमे यू ही आगे निकल जाना है, खुद को अपनी मंजिल तक पहुचाना है, बस चलते जाना है, जिंदगी की हर एक समस्या को सुलझाना है अटकना कही नहीं बस आगे जिंदगी संग बढ़ते जाना है, राहे कठिन है लेकिन संभल कर चलना है क्युकी ज़िंदगी की समस्या का हल करना है।
समस्या को सामने खड़ा देख भागना नहीं है उसका डट कर मुकाबला करना है।
लड़को को गलतफहमी
हर लड़के को यही लगता है की वो लड़की उसे घूर रही है,लेकिन वह लड़की ऐसा बिल्कुल भी नहीं कर रही होती ,यह लड़कों की गलतफहमी है जिसमे वह सुधार नहीं कर रहे है। एक दिन उनको पछतावा होता है इस बात का की वो गलत थे इस बारे में
कोई लड़की हँसे इसका मतलब बिल्कुल भी नहीं की वो फंस रही है, इसलिए कृपया कर ऐसी गलतफहमी बिल्कुल न रखे।
तुम्हारा ख्याल
तुम्हारा ख्याल कुछ इस तरह से आना
ओर जिंदगी का बेहाल सा हो जाना
इन ख्यालों को रोकू कैसे
इन ख्यालों को टोकू कैसे
जरा सा रुक ओर ख्याल कर मेरा भी
हर बात में इन ख्यालों से सवाल कैसे
अगर ना पुछू तो जवाब कैसे
उखड़ा हुआ है कुछ कुछ
अब बिन बात के इन ख्यालों में बवाल कैसे
बस तेरा आना
तेरा जाना इन ख्यालों से दूरी बनाना
अब कैसे इन ख्यालों बिन खुद के साथ हो जाना
यह भी पढे: मेरे ख्यालों में, पता नहीं मुझे, मैं और तुम, बहुत सारा ख्याल, मेरे ख्यालों में ही,
सवालों में गुम
सवालों में गुम हूँ मैं कुछ तरह से, गुम हूँ जैसे उत्तर सिर्फ मैं ही हूँ प्रश्न जो पूछता हूँ खुद से उत्तर भीतर से बाहर निकल मुझको मुझसे ही रूबरू करता हो जैसे , बस बताऊ क्या हाल अपना सवाल पर सवाल बढ़ रहा था जबसे भीतर से आवाज का सिलसिला चल उठा है बाहर सब खाली हो रहा है। बाहर कोई प्रश्न नहीं है उन प्रश्नों के उत्तर मुझे भीतर ही मिल रहे है।
बाहर जैसे कुछ नहीं है, सबकुछ भीतर से ही उत्पन्न हो रहा है, और भीतर ही समाप्त हो रहा है।
कुछ जो ख्वाब थे
कुछ जो ख्वाब थे ,कुछ इन ख्वाबों की बाते थी ,इन ख्वाबों संग कुछ यादे भी थी , उन यादों में कुछ मुलाकते भी थी, कुछ इंतजार था और कुछ बेकरार था, वो यादे जो थी कुछ बेहतर होने को ,जिंदगी के संग जिंदगी होने को थी।
कुछ जो ख्वाब थे, वो आज भी ताजा हैं,
जैसे नदी के पानी में तैरते थे वो आज भी संग हैं।
छोटी-छोटी उमंगों से भरी थी वो रातें,
जब अकेले में भी लगता था कुछ साथ हैं।
वो ख्वाब बन कर उड़ जाते थे सुबह को,
जैसे हवा में ताजगी का एहसास हो।
खुली आंखों से देखा जाए तो लगता है,
वो ख्वाब ही थे जो असलीता से भी बेहतर हैं।
जो ख्वाब थे, वो आज भी ताजा हैं,
जैसे नदी के पानी में तैरते थे वो आज भी संग हैं।
हर एक ख्वाब ने दिल में उत्साह भरा था,
जैसे बनाना हो खुशियों का घेरा था।
मगर जब राह में आई तकलीफें और मुश्किलें,
तब ख्वाबों ने मदद की थी और सहारा दिया था।
जो ख्वाब थे, वो आज भी ताजा हैं,
जैसे नदी के पानी में तैरते थे वो आज भी संग हैं।
ख्वाबों से भरी हुई थी हमारी जिंदगी,
जो बनते थे हमारे सपनों की रचनाएं।
आज उन ख्वाबों को हम बहुत याद करते हैं,
जो हमको जीने की राह दिखाते थे और भरोसा दिलाते थे।
इन ख्वाबों को नहीं भूल सकते हम,
क्योंकि इन्ही ख्वाबों से हमने अपने जीवन की कहानी लिखी हैं।
जो ख्वाब थे, वो आज भी ताजा हैं,
जैसे नदी के पानी में तैरते थे वो आज भी संग हैं।
उनसे अलग हुआ भी जाए तो कैसे, उन ख्वाबों बिन रहा भी जाए तो कैसे उनके ना होने पर ख्वाबों में ही अब उनसे मुलाकात होती है वरना असल में तो बस इंतजार ही है उनका
यह भी पढे: बड़े अधूरे अधूरे, ख्वाबों की डोर, अपने ख्वाबों की डोर,
हिसाब किताब
कुछ हिसाब किताब अब भी बाकी है,
कुछ सवाल जवाब अब भी बाकी है।
ज़िन्दगी की ये लड़ाई हमेशा जारी है,
सफलता की राहों में अटके हमारे पैर।
कितने ही रास्ते हमने चुने,
कितनी बार हमने बदले मुड़ लिए।
मगर एक बार फिर से उठेंगे हम,
इन अटके पैरों को ज़मीन पे जमाएंगे हम।
हर सवाल का जवाब हमें मिलेगा,
हर मुश्किल में एक नया सीख मिलेगा।
क्या हम हार मानेंगे ज़िन्दगी से,
नहीं, हम फिर से लड़ जाएँगे ज़िन्दगी से।
कुछ हिसाब किताब अब भी बाकी है,
कुछ सवाल जवाब अब भी बाकी है।
लेकिन हम नहीं हारेंगे इस लड़ाई से,
हम जीतेंगे, और जीतेंगे हम सबको साथ लेके।
यह भी पढे: छोटी कविता,
ख्यालों को अधूरा कैसे
ख्यालों को अधूरा कैसे छोड़ दु , जिन ख्यालों के सहारे जी रहा हूँ , ख्यालों को अधूरा कैसे छोड़ दु,
जो मेरे साथ चला हर वक़्त मुझसे जुड़ा हुआ है।
कैसे छोड़ दूँ उन्हें जो मेरे दिल के कोने में बसे हुए हैं,
जो मुझे हमेशा याद रखने को कहते हैं।
ख्यालों की दुनिया में मैं हर पल बसता हूँ,
तनहाई में भी वो मुझसे मुलाकात करते हैं।
उनके बिना मेरी ज़िन्दगी मायूष सी लगती है,
ख्यालों के सहारे ही तो मैं जी रहा हूँ अब तक।
लेकिन ऐसा होता है कभी-कभी,
कि ख्यालों का साथ छूट जाता है मेरे से।
कौनसा वो तार है जो टूट जाता है , उनकी यादों के साथ मैं अकेला रह जाता हूँ,
उनके बिना जीना मुश्किल स हो जाता है।
अधूरा कैसे छोड़ दूँ उन्हें जो मेरे दिल में बसे हुए हैं,
जो मुझे हमेशा याद रखने को कहते हैं।
ख्यालों को अधूरा छोड़ने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ,
वो मुझसे जुड़े हुए हैं, मेरे साथ हमेशा रहेंगे।
ख्यालों को अधूरा छोड़ने से पहले,
मैं उन्हें पूरा कर लूँगा जी भर के।
उनसे बातें करूँगा, खुशियों के पल बिताऊंगा,
और उनसे कहूँगा कि वो मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा हैं, कहानी है, वो किस्सा है
आदिपुरुष फिल्म
समय बता रहा है की पैसा बहुत बड़ी चीज है, यदि आप देख रहे है आदिपुरुष फिल्म तो आप समझ ही जाएंगे की आपकी भावनाओ से फिल्म के निर्देशक ओर ऐक्टर को आपकी भावनाओ से कोई लेना देना नहीं है इस फिल्म में आपको भद्दी भाषा, अमर्यादित रूप, रावण एक ब्रह्माण था जिस ब्रह्माण के हाथों में गोश्त का टुकड़ा दिखाते है।
आदिपुरुष फिल्म में इस तरह से आपकी भावनाओ को आहात किया गया है की आप सोच भी नहीं सकते मनोज मुंतसिर एक टीवी इंटरव्यू में कहते है की उनकी नानी- दादी उनको इसी भाषा में कथा सुनाया करती थी यदि वो इसी भाषा में सुनाया करती थी तो वह अपने बच्चों को सुनाया करे ना इस तरह से हमारे देश में गंदगी क्यों परोस रहे है?
क्या आप आदिपुरुष फिल्म को देखकर खुश है?
मैं तो बिल्कुल भी खुश ओर सहमत नहीं हूँ आदिपुरुष फिल्म को देखकर , मैंने आदिपुरुष फिल्म पहले दिन देखी ओर यह फिल्म बर्दास्त करने की हद से बाहर थी मध्यांतर के बाद तो, लेकिन मैं रुका रहा शायद अब अच्छा कुछ दिखेगा लेकिन आदिपुरुष फिल्म अपने अंतिम चरण में आ गई थी परंतु कुछ अच्छा नहीं दिखा बस दिखा तो सिर्फ नुकसान जो राम कथा का इन लोगों ने किया।
क्या आपके पास शब्द कम पड़ गए थे? जो आपने संवाद खत्म कर दिया था, आदिपुरुष फिल्म में संवाद का कोई स्थान नहीं था, कही से कही तक कोई भी संवाद नहीं था जहां आपको कुछ सीखने को मिले उल्टा आदिपुरुष फिल्म देखने पर भद्दी हंसी आती है जिसको हम कहते है की यह क्या कह दिया है मतलब सिर्फ किरदारों का अपनाम नहीं शब्दों का भी मान नहीं रखा मनोज मुंतशीर ने।
मनोज मुंतशीर माफी मांगने को भी तैयार नहीं है उन्हे लगता है की उन्होंने कोई गलती नहीं है बस बता रहे की हम डाइअलॉग को बदल कर फिर से आपके सामने फिल्म आदिपुरुष को दुबारा पेश कर देंगे कुछ दिनों में
आदिपुरुष फिल्म के ऐक्टर प्रभास जो अभी तक फिल्म को बढ़ावा दे रहे है ओर हर रोज ट्विटर पर अपडेट कर रहे है की उनकी फिल्म हर रोज रिकार्ड ब्रेक कर रही है ओर खूब अच्छी कमाई कर रही है, वैसे यह सभी झूठे आकडे दिखा रहे है, क्युकी फिल्म एक भद्दा मजाक है इसमे कुछ अच्छा नहीं है एसा की फिल्म को देखा जाए ओर सराहा जा सके इस फिल्म में सिर्फ डाइअलॉग ही नहीं उसके अलावा भी बहुत सारी कमिया है फिल्म आदिपुरुष में जिस प्रकार से रावण एक पक्षी को मीट खिला रहा है।
इंदरजीत के पूरे बदन पर टैटू बने हुए है
हनुमान जी प्रणाम की जगह सीने पर हाथ रखते है यह लोग यह पर मिस्टर इंडिया की फिल्म के हियर कमैन्डो कर रहे थे क्या? कुछ समझ नहीं फिल्म में क्या हो रहा था।
श्री राम श्वेत वस्त्रों में दिखते है भाई हम लोग साधु है यीसु नहीं
रावण के बालों का डिजाइन
सुग्रीव ओर बाली को गोरिल्ला बना देना
माता सीता का अपहरण
कुल मिलाकर फिल्म को बढ़ावा ना दे सेंसर बोर्ड को यह फिल्म पास नहीं करनी चाहिए थी ओर अब फिल्म को बैन कर देना चाहिए दुबारा कभी इसे किसी भी टीवी चैनल व अन्य किसी माध्यम से नहीं दिखनी चाहिए।