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फैसला

कई बार हम जो फैसला सोच कर करते है उस पर अडिग नहीं हो पाते ओर उस फैसले से हट जाते है हमे लगता है की यह फैसला हमने गलत ले लिया है ओर उस पर पछताते है, किसी भी निर्णय पर आने के लिए हमे काम से काम 2-3 बार सोचना चाहिए की हम सही है या गलत

इसलिए अपने किसी भी निर्णय को लेने के लिए उसके बारे में कई बार सोचना चाहिए की यह निर्णय सही है या नहीं बिना सोचे समझे हमे कुछ नहीं करना चाहिए क्युकी आगे जो चुनोती आती है, ओर भी बड़ी हो सकती है इसलिए फैसले जल्दबाजी में नहीं हो वह शांत दिमाग से लिए जाए तो बेहतर है!

फैसला सोच समझकर कर लिया जाए, फैसला लेने से पहले हमे यह सोचना चाहिए की हमारे पीछे कई ओर जिंदगी भी है। सिर्फ हम ही नहीं है उस निर्णय के पीछे, उसके पीछे बहुत सारे लोग होते है जिनका आपसे कोई संबंध है।

क्या हार भी अच्छी

क्या हार भी अच्छी होती है
हार में शिक्षा अपरंपार….
वही बने जीतने का आधार ।
हारे हम हिसाब से न हरे बेहिसाब….
खुल के खेलने वाले नहीं है हम जनाब ।
वो लोग हटकें अलग होते है जो लुटा देते
समस्त…
उसमें अथाह हानि लाभ की संभावना भी ज़बरदस्त ।
हारने के बाद जीतने वाला होता वो बाज़ीगर ..
ये उस शख़्सियत का असर उसका हुनर ।

दिखावा करना

दुनिया में दिखावा करना ….
कोई नहीं हमसाया ।
कही न कही यह स्वय का दोष …
जो चाहता तो हे स्वय के लिए मिले
ऐसा व्यक्तित्व लेकिन नहीं किसी के लिए मैं इस शिद्दत से जी पाया ।
बाहर तो हम कह सकते है आसान हे यह सही नहीं वो कितना ग़लत…..
प्रश्न स्वय से किया कभी मैंने किसके लिये क्या किया ? क्यूँ मैं माँग रहा कितनी मेरी है समझ।

स्वय को कम आंकना नहीं मेरा मक़सद….
बस उम्मीदों के कारवाँ से बचना ही सही, मायने में स्वय की सही अर्थों में मदद।

समय गूंगा नहीं है

ये समय गूंगा नहीं है बस रहता यह मौन….
समय पर देता बता किसका ही कौन ।
समय से सब कुछ मान सम्मान या अपमान …
समय जब अपना तो गधा भी पहलवान ।

समय से करो संवाद उसके हृदय को जानो…
उसकी निरंतरता निष्पक्षता को तुम पहचानो।
निरंतरता और निष्पक्षता एक कठिन साधना..
अहंकार की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पड़ेगा तोड़ना टापना ।

इन सब बाँतो का नही कही पाठ्यक्रम ….
जीवन में श्रेष्ठ को जानने के कठिन नियम ।
हर घटना में समय सदा था हे और रहेगा साक्षी….
यह समय की अनिवार्य शर्त दिखती हर घटना में उसकी यह बानगी ।

यह भी पढे: समय का नहीं अवरोध, अच्छा समय आएगा, समय का सदुपयोग,

यादों का सिलसिला

कुछ इश्क भी था, कुछ इश्क की बाते, कुछ बेसब्र थी जिंदगी, तो कुछ बेसब्र उनसे मुलाकाते, बस सफर यू ही कटने को था, रह गई मेरी अधूरी यादे, और उनकी यादों का सिलसिला, कुछ दूर तक ओर चला, जिंदगी का दौर खत्म हुआ, अब मौत के साथ मेरी गुफ्तगू हो गई।

कुछ इश्क़ भी था पर अब वो नहीं है,
जब चाहत थी तब हम थे वो नहीं है।

रात भर जागते थे हम उसके इंतज़ार में,
पर अब वो नहीं है जिसकी तलाश में।

हमने चाहा था उसे सबसे ज़्यादा,
पर वो तो बस एक ख्वाब बन कर रह गया।

जिस दिन उससे मिलने की ख़ुशी थी हमें,
वो दिन भी गुज़र गया, वो वक़्त नहीं है।

कुछ इश्क़ भी था पर अब वो नहीं है,
जब चाहत थी तब हम थे वो नहीं है।

उनकी यादों का सिलसिला कुछ इस तरह
क्या उन्हे मिलने की वो चाहत नहीं थी जो हमारे दिल में थी।

पर अब उससे मिलने की कोई आस नहीं है,
कुछ इश्क़ भी था पर अब वो नहीं है।

इन्हे भी पढे: तुम्हारी यादों का ढेर, तेरी यादे,

क्या अब लोग पढ़ते है?

यह किताब की दुकान इतनी बड़ी “आजकल कौन पढ़ता है ” या आजकल भी लोग पढ़ते है क्या? लोगों की सोच को क्या हो गया है यह बात समझ से बारे हो जाती है ब कुछ लोग ऐसे प्रश्न पूछते है की आप पढ़कर करोगे क्या ? कितना कमाओगे ? इतना तो मैं इसी काम से कमा लेता हूँ फिर पढ़कर क्या करना और क्यों पढ़ना फिर इतना

जब इस प्रकार के प्रश्न मन में आने लग जाते है तब पढ़ाई से रुझान हट जाता है यदि आप आजकल की पीढ़ी को सिर्फ यही समझाओ की पढ़ाई करके तुम्हें पैसा कमाना है बस ओर कुछ नहीं करना जिस काम में ज्यादा पैसा मिले वही करना है बस ओर कुछ यदि इसी प्रकार के विचार आप इस पीढ़ी में डालेंगे तो फिर वह उसी प्रकार की सोच को विकसित करेंगे इसके विपरित फिर कुछ कैसे आएगा?

इस जमाने में ज्यादा लोग पढ़ने चाहिए या कम यह बात मुझे समझ नहीं आती कई बार यह प्रश्न बाद विचित्र सा लगता है की लोग पढ़ते है क्या ? क्यू पढ़ते है ? आजकल कौन पढ़ता है , क्या इतनी किताबे बिकती है? यह प्रश्न बड़े अजीब है

लोगों का ध्यान कपड़े ओर जूते की खरीदारी में ज्यादा है लेकिन किताबों में नहीं, लग अलग तरह ए जूते तो खरीदने है लेकिन किताबे नहीं पैर अच्छे दिखने चाहिए लेकिन दिमाग बढ़े या नहीं इस बात से कोई लेना देना नहीं है शरीर अच्छा दिखना चाहिए , बाल अच्छे लगने चाहिए , कही मेरे बाल तो नहीं ऊढ़ रहे है इस बात पर ध्यान है लेकिन बुद्धि में कोई फरक आया इस बात में कोई ध्यान नहीं है,

आजकल तो बहुत अच्छी अच्छी किताबे पढ़ने को मिल जाती है ओर आप उनसे बहुत कुछ सिख सकते है यदि आपका यह प्रश्न उठता है की अब पढ़कर क्या करेंगे ,आजकल कौन पढ़ता है या अब सिख कर क्या करेंगे तो फिर इसका प्रतिउत्तर यही है की अब अच्छे जूते ओर कपड़े पहन कर भी क्या करोगे ? साथ ही दिमाग अच्छा नहीं है तो अपने बच्चों को क्या अच्छी शिक्षा दोगे , क्या संस्कार दोगे क्या अपनी अगली पीढ़ी में ट्रांसफेर करके जा रहे हो?

दूर करे अंधकार

वो कौनसे वार है जो दूर करे अंधकार , हर एक शब्द हर एक विचार हमारे जीवन को उच्च बनाता है , इन अनमोल वचनों को हमे जीवन में उतारते रहना चाहिए।

ऐसे कौन से “वार” प्रतिदिन दूर करे अंधकार ।
ऐसा कौनसी “ गार” जिससे चलता पूरा महीने का पहिया मज़ेदार ।
ऐसा कौन का “हार” जो स्वादिष्ट खाने का आधार ।
ऐसा कौन सा “चार” जिसका खट्टा मीठा संसार ।

जवाब दीजिए ,
हर सुबह आपकी अच्छी शुरुआत हो बहुत शुभ और लाभकारी हो।


अच्छे रिश्ते

अच्छे रिश्तों में कोई शर्त नहीं होती वह अच्छे रिश्ते ओर बेहतर हो जाते है जिनमे विश्वास की अटूट डोर है, हर मुश्किल की घड़ी को विस्वास की नीव पर रखेओर मजबूत होते है रिश्ते, जिनका बंधन अटूट से अटूट बन जाता है।

अच्छे रिश्तों में नहीं कोई शर्त.
विश्वास ही गहना उसका अर्थ
दो खूबसूरत दिलो की जोड़ी
बढ़ जाती ख़ुशियाँ चाहे होती थोड़ी ।

रिश्ता एकम रिश्ता
रिश्ता दूए साथ
रिश्ता तिये सोच
रिश्ता चोके सच्चाई
रिश्ता पंजे सम्मान
रिश्ता छक्के संकल्प
रिश्ता सत्ते समझ
रिश्ता अठ्ठे सुंदरता
रिश्ता निम्मे संतुलन
रिश्ता दस्से स्वर्ग ।

यह भी पढे: रिश्ते, लगन की चमक, वादा, सामाजिक प्राणी,

बस ओर मेट्रो

बस ओर मेट्रो

एक समय था जब नीली वाली प्राइवेट बस चला करती थी, उसमे बहुत भीड़ होती थी और लोग लटक लटक जाते थे, ज्यादातर लोग गेट पर ही खड़े हो जाते थे, आज जब मेट्रो चलने लगी है तब भी लोगों में वही आदत है लोग गेट पर ही खड़े रहते है, वहाँ से हटते ही नहीं है।

पता नहीं लोगों को क्या लगता है की उन्हे वही खड़ा रहना है, जैसे एकदम से कूदेंगे जैसे ही मेट्रो रुकेगी, चाहे मेट्रो में भीड़ हो या नहीं, लेकिन उन लोगों को तो गेट पर ही खड़ा होना है जैसे सारा आनंद उनको गेट पर ही मिलेगा, किसी को भीतर आने ओर बाहर जाने का रास्ता आसानी से नहीं मिल पाता है, ये लोग ऐसे अढ़ कर खड़े हो जाते है, जैसे की अब जगह नहीं बची है किसी को प्रवेश नहीं होगा।

मेट्रो के तो गेट बंद हो जाते है, इसमे लटक भी नहीं सकते फिर भी यह लोग गेट पर खड़े होते है, पहले जो नीली वाली बसे चलती थी, उन्मे ज़्यादार लोग बस की सीढ़ियों पर ही खड़े रहते थे।

तो मुझे इन गेट पर खड़े होने वाले लोगों को देखकर वही दृश्य याद आता है, जो आजसे 15 साल पहले  होता था, लोग उस समय एक बस के इंतजार में आधे घंटे तक खड़े रहते थे, लेकिन आज इतनी जल्दी होती है, एक मेट्रो का इंतजार वो 2 मिनट नहीं कर पाते पता नहीं कितनी जल्दी है।

अब लोगों को की उनसे इंतजार के 2 मिनट नहीं बीतते दिल्ली मेट्रो के कुछ स्टेशन जैसे राजीव चौक, कश्मीरी गेट, स्टेशन पर तो लोग ऐसे धक्का मुक्की करते है, ओर उसके बाद जैसे की दूसरी कोई मेट्रो तो ही नहीं आएगी इस तरह से वो उसमे धक्का मुक्की करने लग जाते है।

मेट्रो का सफर बहुत आरामदायक हो चुका है, पहले से बेहतर है सब कुछ बेहतर हो रहा है फिर भी इंसान परेशान सा लगता है, इतना आरामदायक जीवन हो चला है, फिर भी कही फंस हुआ लग रहा है ये इंसान..

आज से 10 साल पहले जब रात 9 बजे बस सर्विस नहीं थी या कम थी तब घंटे भर तक एक बस का इंतजार करना पड़ता था ओर वो भी बिल्कुल भरी हुई आती थी, लेकिन आज के समय में लगातार बस भी है ओर मेट्रो भी हर 2 मिनट बाद मेट्रो आ जाती है रात 11 बजे तक तो मेट्रो चलती है, कुछ स्टेशन के लिए 12 बजे तक की भी सर्विस है फिर भी लोग बेचैन हो जाते है।

समय के साथ सबकुछ बेहतर हो रहा है, लेकिन क्या इंसान बेहतर हो पा रहा है इंसान उसी तरह से, उसी सोच के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा है उसमे कोई बदलाव नहीं दिख रहा है!

नाम था उस शहर का

मेरी कविता का शीर्षक है “नाम था उस शहर का”

चल दिए वो जिस शहर की ओर नाम था उस शहर का कुछ और , बस वो अपनी मस्ती में हो रहे थे धुन सवार कही कोई न कह दे , कुछ उनसे के वापस चलो फिर उसी ओर

चल दिए बस ना जाने कही, इस तरह छोड़ कर अकेले मुझे,
जीवन की इस भीड़ में छूट गए आप, मेरे दिल के साथ तुम्हारी याद भी गयी।

आज तक नहीं भूल सकता, वह दिन जब हम साथ थे,
खुशियों से भरी हर पल था, हम दोनों के लिए तय।

पर अब आप चले गए, चले गए मेरी जिंदगी से दूर,
मेरे दिल में आपकी यादें बसी हैं, जो हमेशा मेरे साथ हैं और रहेंगी।

चल दिए बस ना जाने कही, ये बात हमें हमेशा सताती है,
पर मैं जानता हूँ कि कहीं ना कहीं आप भी मेरे साथ हो,
क्योंकि हमारी यादों को कोई दूर नहीं कर सकता।

चल दिए बस ना जाने कही, लेकिन आपकी यादें हमेशा हमसे होंगी,
जब भी तन्हाई के लम्हे होंगे, तो आपकी यादें हमेशा हमारे साथ होंगी।

चल दिए बस ना जाने कही, ये बात हमेशा दर्द देती है,
पर मैं जानता हूँ कि आप हमेशा मेरे साथ होंगे,
क्योंकि हमारी यादों को कोई दूर नहीं कर सकता।

चल दिए वो जिस शहर की ओर नाम था उस शहर का कुछ और , बस वो अपनी मस्ती में हो रहे थे धुन सवार कही कोई न कह दे ,

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