सुबह लिखने की आदत ने मेरी जिंदगी कैसे बदली | आदत का असली महत्व

हर सुबह बैठ जाना ही मेरी सबसे बड़ी सफलता है, हर सुबह लिखने की आदत ने मेरी जिंदगी बदली

हर सुबह समय पर उठ जाना और लिखने के लिए बैठ जाना मुझे एक अलग तरह का सुकून देता है।

सच कहूँ तो आज भी कई बार आलस आता है। कई बार नींद इतनी गहरी होती है कि मन कहता है—”आज रहने दो, कल से फिर शुरू करेंगे।” लेकिन अब मैंने अपने मन की हर बात मानना छोड़ दिया है।

मैं उठता हूँ।

अपनी कॉपी और पेन लेकर बैठ जाता हूँ।

उसके बाद चाहे एक पंक्ति लिखूँ या दस पन्ने, यह मेरे लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है।

मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं बैठ गया।

पहले मैं सोचता था कि हर दिन कुछ असाधारण लिखना चाहिए। यदि अच्छा नहीं लिख पाया तो दिन बेकार चला गया। लेकिन अब मेरी सोच बदल गई है।

हर दिन महान लिखा जाए, यह ज़रूरी नहीं।

और हर दिन कुछ न लिख पाना भी ठीक नहीं।

ज़रूरी केवल इतना है कि लेखक अपने समय पर अपनी जगह पर बैठा मिले।

पिछले पंद्रह दिनों से मैं लगातार सुबह साढ़े चार बजे उठ रहा हूँ। अब यह धीरे-धीरे मेरी आदत बनती जा रही है। अभी भी कभी-कभी नींद आती है, लेकिन पहले जैसी परेशानी नहीं होती। शरीर इस नई दिनचर्या को स्वीकार करने लगा है।

मुझे अब यह डर नहीं रहता कि आज कितना लिखूँगा।

मुझे केवल यह डर रहता है कि कहीं यह आदत छूट न जाए।

क्योंकि मुझे समझ आ गया है कि यदि आदत बची रहेगी, तो शब्द भी लौट आएँगे।

सुबह का एक और बड़ा लाभ मुझे यह मिला कि अब दिन भर अपने कामों को लेकर उतनी चिंता नहीं रहती।

यदि सुबह एक या दो घंटे लिख लिया, सोच लिया या अपने भीतर के विचारों को देख लिया, तो दिन चाहे दुकान, घर या दूसरे कामों में निकल जाए, मुझे अफसोस नहीं होता। मैं जानता हूँ कि मैंने दिन का सबसे महत्वपूर्ण काम पहले ही पूरा कर लिया है।

पहले ऐसा नहीं था।

दिन में लिखने की कोशिश करता था तो कभी लिखने का समय नहीं मिलता था। और जब समय मिलता था, तब लिखी हुई बातों को ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं कर पाता था। कई वर्षों तक यही चलता रहा। परिणाम यह हुआ कि मैं लगातार अपने लक्ष्य से दूर होता गया।

अब पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि लिखने और उसे प्रकाशित करने के लिए मेरे पास पर्याप्त समय है।

सुबह का वातावरण भी मेरे लिए बहुत अनुकूल है।

इस समय मन शांत रहता है। विचारों का शोर कम होता है। दिमाग इधर-उधर नहीं भागता। इसलिए लिखते समय ध्यान अपने आप एक जगह टिक जाता है।

कल रात मैं लगभग साढ़े बारह बजे सोया। देर से घर पहुँचा क्योंकि रास्ते में बहुत ट्रैफिक था। पहले शायद मैं यही सोचकर सुबह देर तक सोता रहता।

लेकिन अब मैं जानता हूँ कि यदि एक दिन देर तक सो गया, तो केवल सुबह ही नहीं छूटेगी, धीरे-धीरे पूरी आदत कमजोर होने लगेगी।

इसीलिए मैं उठ गया।

यहीं मुझे एक और बात समझ आई।

आज हमारी जीवनशैली बदल चुकी है। मोबाइल, देर रात तक जागना, किसी भी समय खाना, लगातार स्क्रीन पर बने रहना—इन सबने हमारे शरीर की प्राकृतिक लय को बदल दिया है।

जब खाने और सोने का कोई निश्चित समय नहीं होता, तब मन भी अस्थिर होने लगता है। शरीर भी उसी अस्थिरता को अपनाने लगता है।

शायद इसीलिए सुबह का अनुशासन केवल समय पर उठने का नियम नहीं है।

यह अपने पूरे जीवन को एक नई दिशा देने का अभ्यास है।

आज मुझे सफलता से ज़्यादा खुशी इस बात की है कि मैं लगातार अपने नियम का पालन कर रहा हूँ।

हो सकता है मेरे लिखे हुए शब्द बहुत अच्छे न हो लेकिन हर सुबह लिखने की आदत ने ही शायद मुझे असल में लिखने सिखा दिया है। पहले बस जो विचार आता था उसको पकड़कर लिख देता था जितना भी लिखा जाए चाहे वो 2 शब्द हो या 2 लाइन बस उसी को लिख पाता था लेकिन अब विस्तार से लिखता हूं।

हो सकता है कई दिनों तक मुझे लगे कि मैंने कुछ विशेष नहीं लिखा, लेकिन कुछ हर रोज सुबह उठ कर लिखा यही एक बहुत बड़ा सुकून है।

लेकिन मैं यह जानता हूँ कि जो व्यक्ति हर दिन अपने काम के लिए बैठता है, वह एक दिन अवश्य बेहतर लिखने लगता है।

क्योंकि उत्कृष्ट लेखन किसी एक दिन नहीं जन्म लेता।

वह हर सुबह निभाए गए एक छोटे-से नियम से जन्म लेता है।

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