सुबह और शाम के लिखने का अंतर | लेखक के अनुभव से दोनों में

सुबह और शाम का लेखन: मुझे दोनों में क्या अंतर मिला?

कल शाम लगभग पाँच बजे मैं कुछ समय के लिए खाली था। तबीयत भी पहले से बेहतर लग रही थी, इसलिए सोचा कि थोड़ा लिख लिया जाए।

कॉपी खोली, पेन हाथ में लिया, लेकिन कुछ देर तक समझ ही नहीं आया कि लिखूँ क्या।

शब्द जैसे भीतर थे, पर बाहर आने के लिए तैयार नहीं थे।

अजीब बात यह है कि मन के भीतर लगातार बातचीत चल रही थी, लेकिन जैसे ही उसे कागज़ पर उतारने की कोशिश करता, शब्द कहीं छिप जाते। कई बार एक वाक्य शुरू होता और बीच में ही रुक जाता। कभी कोई शब्द छूट जाता, तो कभी विचार किसी दूसरी दिशा में निकल जाता।

तब मुझे एहसास हुआ कि दिन और शाम के समय मेरे साथ अक्सर यही होता है।

मैं लिखने से ज़्यादा शब्दों को खोजता रहता हूँ।

कुछ देर बाद मैं अपने पुराने ड्राफ्ट देखने लगा। उनमें भी यही पैटर्न दिखाई दिया। हर दो-चार पंक्तियों के बाद विषय बदल जाता था। एक विचार पूरा होने से पहले ही दूसरा विचार आ जाता था। परिणाम यह होता था कि कोई भी बात पूरी गहराई तक नहीं पहुँच पाती थी।

इसके ठीक विपरीत, जब मैं सुबह लिखता हूँ तो अनुभव बिल्कुल अलग होता है।

सुबह शब्दों को ढूँढ़ना नहीं पड़ता।

वे जैसे स्वयं चलकर कागज़ पर आ जाते हैं।

विचारों में जल्दबाज़ी नहीं होती। मन शांत रहता है और एक ही विषय पर लंबे समय तक टिक पाता है। लिखते समय बार-बार रुकना नहीं पड़ता और शब्दों में एक स्वाभाविक प्रवाह बना रहता है।

मुझे अब समझ आने लगा है कि केवल लिखने की इच्छा पर्याप्त नहीं होती।

लिखने का सही समय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

हर व्यक्ति का एक ऐसा समय होता है जब उसका मन सबसे अधिक स्पष्ट होता है। मेरे लिए वह समय सुबह है।

सुबह न मोबाइल के नोटिफिकेशन परेशान करते हैं, न दिनभर की जिम्मेदारियाँ सामने खड़ी होती हैं और न ही मन कई दिशाओं में भागता है। इस समय केवल मैं होता हूँ, मेरे विचार होते हैं और एक खाली पन्ना होता है।

इसी शांति में शब्द भी बिना किसी रुकावट के बाहर आने लगते हैं।

शायद इसलिए अब मैंने तय कर लिया है कि मेरा सबसे महत्वपूर्ण लेखन सुबह ही होगा।

दिन और शाम के समय दूसरे काम किए जा सकते हैं—ब्लॉग संपादित करना, पढ़ना, योजना बनाना या बाकी जिम्मेदारियाँ निभाना। लेकिन नए विचारों को जन्म देने का काम मैं सुबह ही करना चाहता हूँ।

इस अनुभव ने मुझे एक और बात सिखाई।

हममें से बहुत-से लोग यह सोचते रहते हैं कि हमारे भीतर प्रतिभा की कमी है, जबकि कई बार समस्या प्रतिभा की नहीं, समय के चुनाव की होती है।

हो सकता है आपका सबसे अच्छा समय सुबह न हो।

हो सकता है वह दोपहर हो या देर रात।

लेकिन यदि किसी काम में बार-बार रुकावट आ रही है, मन नहीं लग रहा है या ध्यान टिक नहीं रहा है, तो केवल मेहनत बढ़ाने के बजाय एक बार अपना समय बदलकर भी देखिए।

कई बार जीवन बदलने के लिए काम बदलने की आवश्यकता नहीं होती।

केवल उसका समय बदलना ही पर्याप्त होता है।

हर व्यक्ति के दिन में चौबीस घंटे होते हैं।

लेकिन इन चौबीस घंटों में ऐसे दो घंटे अवश्य होते हैं जब मन सबसे अधिक शांत, स्पष्ट और एकाग्र होता है। यदि आप उन दो घंटों को पहचान लें और उन्हें अपने सबसे महत्वपूर्ण काम के लिए सुरक्षित कर दें, तो धीरे-धीरे परिणाम बदलने लगते हैं।

बचपन में हम सबका एक टाइम-टेबल हुआ करता था। पढ़ने का समय अलग, खेलने का अलग और आराम का अलग। बड़े होने के साथ वह टाइम-टेबल तो छूट गया, लेकिन उसकी आवश्यकता कभी समाप्त नहीं हुई।

आज भी शायद हमें उसी अनुशासन की ज़रूरत है।

क्योंकि लक्ष्य केवल मेहनत करने से नहीं मिलता।

लक्ष्य तब मिलता है जब सही काम, सही समय पर, लगातार किया जाए।

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