सुबह की आदत ने मेरे भीतर के लेखक को फिर से जिंदा कर दिया
आज मेरी आँखें अलार्म बजने से पहले ही खुल गईं। पहली बार ऐसा लगा कि अब शरीर धीरे-धीरे इस नई दिनचर्या को स्वीकार करने लगा है। अभी भी शरीर पूरी तरह स्वस्थ नहीं है। हल्की-सी हरारत है, इसलिए आज व्यायाम शायद न कर पाऊँ। लेकिन लिखने के लिए बैठने में कोई कठिनाई नहीं हुई।
यहीं मुझे एहसास हुआ कि आदत तब बनती है, जब शरीर आपको जगाने लगता है और अलार्म केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है।
लगातार उन्नीस दिनों से मैं सुबह साढ़े चार बजे उठ रहा हूँ। शुरुआत में आलस बहुत आता था। आज भी आँखें खुलने के कुछ देर बाद बिस्तर दोबारा बुलाने लगता है। मन कहता है—”थोड़ी देर और सो जाओ।”
लेकिन हर नई आदत का सबसे बड़ा संघर्ष यही होता है।
आलस कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, बल्कि हमें हर दिन उसे हराना सीखना पड़ता है।
कुछ महीने पहले मेरी स्थिति बिल्कुल अलग थी। लिखने की इच्छा धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। समय भी नहीं मिल पाता था। कभी ब्लॉग लिखता, तो उसे प्रकाशित नहीं कर पाता। कभी प्रकाशित करता, तो नया लिखने का समय नहीं मिलता। कई बार महीनों तक वेबसाइट पर कोई नया लेख नहीं जाता था।
ऐसे में वेबसाइट का ट्रैफिक भी कैसे बढ़ता?
एक ब्लॉगर के लिए नियमित लिखना और नियमित प्रकाशित करना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। पाठक उसी लेखक के पास लौटते हैं जो लगातार उनके लिए कुछ नया लेकर आता है।
आज उन्नीस दिनों बाद मुझे लग रहा है कि मैं केवल ब्लॉग नहीं लिख रहा हूँ।
मैं अपने भीतर के उस लेखक को फिर से जीवित कर रहा हूँ, जो धीरे-धीरे कहीं खोता जा रहा था।
शायद यदि मैंने यह आदत शुरू न की होती, तो कुछ वर्षों बाद मैं भी रोज़मर्रा की भागदौड़ में इतना उलझ जाता कि अपने सपनों के बारे में सोचना भी छोड़ देता।
मेरे सपने हमेशा बड़े थे, लेकिन बड़े सपनों से अधिक ज़रूरी बड़े नियम होते हैं।
जब जीवन में अनुशासन नहीं होता, तब सपने भी धीरे-धीरे धुँधले पड़ने लगते हैं।
मैं अक्सर सोचता हूँ कि यदि कोई व्यक्ति हर सुबह केवल दो घंटे भी अपने सबसे महत्वपूर्ण काम को दे, तो एक वर्ष में वह लगभग 730 घंटे उसी काम में लगा चुका होगा।
730 घंटे…
किसी भी कौशल को बेहतर बनाने के लिए यह बहुत बड़ा समय है।
चाहे वह लेखन हो, पढ़ाई हो, नई भाषा सीखना हो, संगीत हो या कोई और सपना—यदि उसे हर सुबह थोड़ा-थोड़ा समय मिले, तो एक वर्ष बाद परिणाम स्वयं दिखाई देने लगते हैं।
मुझे अब शाम की अपेक्षा सुबह अधिक उपयुक्त लगती है।
शाम तक शरीर थक चुका होता है। ऑफिस, दुकान, परिवार और दिनभर की जिम्मेदारियाँ मन को भी थका देती हैं। फिर कोई मित्र आ जाता है, कोई फोन आ जाता है या कोई और काम सामने आ जाता है। धीरे-धीरे हमारा सबसे महत्वपूर्ण काम फिर अगले दिन पर टल जाता है।
लेकिन सुबह अलग होती है।
न मोबाइल के अधिक नोटिफिकेशन होते हैं, न मिलने-जुलने वालों की भीड़ और न ही दिनभर की थकान।
सुबह मन अपेक्षाकृत शांत होता है। विचार भी स्पष्ट होते हैं। इसलिए जो काम सबसे अधिक ध्यान माँगता है, उसके लिए सुबह सबसे उपयुक्त समय है।
इसी आदत का एक और लाभ मुझे मिला।
अब मैं केवल लिख ही नहीं रहा, बल्कि हर सुबह थोड़ा-बहुत व्यायाम भी कर लेता हूँ। पहले न लिखने का समय मिलता था और न ही शरीर के लिए समय निकाल पाता था। अब दोनों काम बिना किसी दबाव के एक ही दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं।
आज मुझे लग रहा है कि मैंने केवल जल्दी उठना नहीं सीखा है।
मैंने अपने सपनों को फिर से समय देना सीख लिया है।
और शायद जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन यही होता है—
जब हम अपने सबसे महत्वपूर्ण काम को दिन के बचे हुए समय पर नहीं छोड़ते, बल्कि दिन का पहला अधिकार उसी को दे देते हैं।
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