सुबह जल्दी उठने की एक छोटी सी आदत| सुबह जल्दी उठने का महत्व

क्या आपके सपने आपकी सुबह की नींद से बड़े हैं? सुबह जल्दी उठने से क्या हो सकता है

यदि मैं आपसे केवल एक प्रश्न पूछूँ—

क्या आपके सपने आपकी सुबह की नींद से बड़े हैं?

हो सकता है इस एक प्रश्न का उत्तर ही यह तय कर दे कि आने वाले वर्षों में आप अपनी मंज़िल के कितने करीब होंगे।

आज 31 जुलाई है। इस महीने का आख़िरी दिन।

इसी महीने मैंने सुबह उठकर लिखने की शुरुआत की थी। उससे पहले मैं किसी भी समय लिख लेता था। जब मन करता, तब लिखता। जब समय मिलता, तब लिखता। मेरा कोई निश्चित नियम नहीं था।

लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि जब हम अपने सबसे महत्वपूर्ण काम को मन के भरोसे छोड़ देते हैं, तब मन हमें उसी काम से सबसे ज़्यादा दूर ले जाता है।

आज लिखने का मन नहीं है…

आज बहुत थक गया हूँ…

कल से शुरू करूँगा…

मन हर दिन कोई नया कारण ढूँढ़ लेता है।

धीरे-धीरे हमारे और हमारे सपनों के बीच दूरी बढ़ने लगती है। शुरुआत में इसका एहसास नहीं होता, लेकिन एक दिन अचानक लगता है कि जिन सपनों के लिए कभी जीते थे, अब उनके बारे में सोचने का समय भी नहीं बचा।

मन हमें उसी जीवन की भागदौड़ में उलझा देता है जो शायद हमें कभी पसंद ही नहीं था, लेकिन मन को पसंद था। इसलिए वह बार-बार हमें उन्हीं आसान और तात्कालिक चीज़ों की ओर खींचता रहता है।

यहीं मैंने एक बात समझी।

हमेशा वही करना ज़रूरी नहीं जो मन चाहता है।

कई बार मन जिन कामों से भागता है, वही काम हमारे जीवन को सबसे अधिक बदलते हैं।

मन सुबह जल्दी उठने देना नहीं चाहता।

मन कठिन अभ्यास नहीं चाहता।

मन अनुशासन नहीं चाहता।

लेकिन इन्हीं चीज़ों के भीतर हमारा भविष्य छिपा होता है।

सुबह की नींद हम सभी को प्रिय होती है। लेकिन वही सुबह हमारे अधूरे सपनों के लिए सबसे कीमती समय भी होती है।

हममें से अधिकांश लोग अपने सपनों को जिम्मेदारियों के कारण छोड़ देते हैं। फिर पूरी ज़िंदगी उन्हीं जिम्मेदारियों के बीच पिसते रहते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि जिम्मेदारियों से भाग जाया जाए।

बल्कि उनका साथ निभाते हुए अपने लिए भी समय निकाला जाए।

अपने सपनों को धीरे-धीरे घुटकर मरने न दिया जाए।

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही होने लगा था।

आज से केवल इक्कीस दिन पहले मैं लगभग हार मान चुका था। मुझे लगने लगा था कि अब मुझसे नहीं होगा। मैं बार-बार स्वयं से कह रहा था कि शायद लिखना मेरे बस की बात नहीं है। मेरा अपने ऊपर से विश्वास टूटने लगा था।

घर चलाने के लिए काम करना ज़रूरी था।

काम के बाद समय ही नहीं बचता था।

कभी लिखता था, कभी नहीं।

कभी इतनी थकान होती थी कि लिखने का मन नहीं करता था।

धीरे-धीरे लिखना मेरी प्राथमिकता नहीं रहा। जो काम मुझे सबसे अधिक प्रिय था, वही सबसे पीछे छूटता जा रहा था।

शायद उस दिन मैं सचमुच लिखना छोड़ देता।

लेकिन उसी समय मुझे एक वीडियो देखने को मिला जिसमें जापानी लेखक हारुकी मुराकामी अपनी दिनचर्या के बारे में बता रहे थे। उन्होंने बताया कि वे सुबह जल्दी उठकर कई घंटों तक केवल लिखते हैं और उसके बाद दिन के बाकी काम करते हैं।

उस दिन मेरे मन में एक विचार बैठ गया।

यदि मैं पूरे दिन को नियंत्रित नहीं कर सकता, तो कम से कम सुबह के दो या तीन घंटे तो अपने लिए सुरक्षित रख सकता हूँ।

मैंने तय किया कि दिन चाहे दुकान, काम या जिम्मेदारियों में बीत जाए, लेकिन सुबह का समय केवल लिखने के लिए होगा।

सुबह जल्दी उठने का यही निर्णय मेरे जीवन का सबसे बड़ा बदलाव बन गया।

आज लगातार सुबह उठकर लिखते हुए मुझे महसूस हो रहा है कि मैं केवल शब्द नहीं लिख रहा हूँ।

मैं अपने भीतर के उस लेखक को फिर से जीवित कर रहा हूँ, जो धीरे-धीरे खोता जा रहा था।

सुबह जल्दी उठने का समय मेरे लिए इसलिए विशेष है क्योंकि उस समय दुनिया भी शांत होती है और मन भी।

न मोबाइल बार-बार ध्यान भटकाता है।

न काम की चिंता होती है।

न बाहर का शोर होता है।

बस मैं होता हूँ, मेरे विचार होते हैं और एक खाली पन्ना होता है।

इसी शांति में मुझे स्वयं से मिलने का अवसर मिलता है।

मेरे अनुभव में सुबह लगभग चार बजे का समय सबसे प्रभावी रहा है। यह हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है, लेकिन इतना निश्चित है कि दिन का सबसे शांत समय ही आपके सबसे महत्वपूर्ण काम के लिए होना चाहिए।

आज मेरा दिन पहले से बड़ा महसूस होता है।

यदि सुबह मैं अपने लक्ष्य के लिए दो घंटे दे देता हूँ, तो उसके बाद दिन चाहे जैसा भी गुज़रे, भीतर संतोष बना रहता है।

मुझे लगता है कि आज मैंने अपने लिए कुछ किया है।

और शायद यही संतोष हमें हर दिन अपनी मंज़िल के थोड़ा और करीब ले जाता है।

इसलिए आज एक बार फिर वही प्रश्न स्वयं से पूछिए—

क्या आपके सपने आपकी सुबह की नींद से बड़े हैं?

यदि आपका उत्तर “हाँ” है, तो कल सुबह केवल अलार्म मत लगाइए।

अपने सपनों को भी जगा दीजिए।

क्योंकि हर सुबह, जब अलार्म बजता है, तब वास्तव में केवल नींद नहीं टूटती—

उस क्षण यह तय होता है कि आप अपने सपनों को चुनेंगे या अपनी सुविधा को।

और यही छोटा-सा चुनाव धीरे-धीरे आपकी पूरी ज़िंदगी की दिशा तय कर देता है।

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