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दुकान पर बैठे-बैठे खुद को और अपने व्यवसाय को बेहतर करना

दुकान पर बैठे-बैठे
अक्सर ऐसा लगता है
कि समय बस कट रहा है।
ग्राहक कम हैं,
काम धीमा है,
और दिन एक-सा बीत जाता है।

लेकिन कभी-कभी
इसी ठहरे हुए समय में
एक बात धीरे से उभरती है—
क्या यह वक्त
सिर्फ इंतज़ार करने के लिए है,
या खुद को थोड़ा बेहतर बनाने के लिए भी?

दुकान पर बैठा दुकानदार
सिर्फ सामान का रखवाला नहीं होता।
वह रोज़
लोगों को देखता है,
उनकी ज़रूरतें समझता है,
उनके सवाल सुनता है।
यही अनुभव
किसी किताब से नहीं मिलता।

जब काम कम होता है,
तो मन भटकता है।
कभी मोबाइल में,
कभी बेकार की सोच में।
लेकिन अगर उसी समय
दुकान को नए नज़रिए से देखा जाए—
तो बहुत कुछ बदला जा सकता है।

दुकान की साज-सज्जा,
सामान की प्रस्तुति,
ग्राहक से बात करने का तरीका—
ये सब
धीरे-धीरे सुधारे जा सकते हैं।
बिना किसी शोर के,
बिना किसी बड़े खर्च के।

आज का समय
सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं है।
जो दुकानदार
ऑफलाइन बैठा है,
वह भी
ऑनलाइन दुनिया से जुड़ सकता है।
दुकान का एक छोटा-सा परिचय,
सामान की तस्वीरें,
या बस
अपनी मौजूदगी का एहसास—
इतना ही काफी होता है
पहला कदम रखने के लिए।

ऑनलाइन जाना
दुकान छोड़ना नहीं होता।
यह दुकान को
थोड़ा आगे बढ़ाना होता है।
जहाँ ग्राहक
सिर्फ सामने से नहीं,
दूर से भी
आप तक पहुँच सकता है।

छोटा व्यवसाय
एक दिन में बड़ा नहीं बनता।
लेकिन रोज़
थोड़ा-सा सुधार,
थोड़ा-सा ध्यान,
और थोड़ा-सा नया सोचने का साहस—
इसी से
व्यवसाय धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

शायद
दुकान पर बैठा यह खाली-सा वक्त
दरअसल
एक मौका है—
खुद को समझने का,
दुकान को सँवारने का,
और अपने छोटे व्यवसाय को
एक नए रास्ते पर ले जाने का।

दुकान पर बैठे-बैठे सारे काम स्वयं नहीं हो जाते उन्हें करना पड़ता है तभी कार्य होते है।

यह भी पढ़ें : दुकानदार का जीवन, दुकान में समान, दुकान पर बैठा रहा,



दुकान पर बैठा रहा, मोबाइल में उलझा रहा — दुकान और ग्राहक

आज दुकान पर बैठा रहा
काम तो दुकान का कुछ खास किया नहीं,
ज़्यादा समय
मोबाइल ही हाथ में रहा।

ना कोई ज़रूरी कॉल थी,
ना कोई जरूरी काम।
बस यूँ ही
स्क्रीन ऊपर–नीचे करता रहा।
कभी किसी की पोस्ट,
कभी किसी की वीडियो,
कभी बिना वजह
समय काटता हुआ।

दुकान सामने खुली थी,
लेकिन मेरा ध्यान
कहीं और अटका हुआ था।

बात बाद में चुभी।
जब एक ग्राहक
दुकान के सामने आकर
थोड़ा रुका,
मुझे देखा
और फिर
चुपचाप
आगे बढ़ गया।

शायद
उसे लगा
कि मैं व्यस्त हूँ।
और सच कहूँ,
मैं वाकई व्यस्त था—
लेकिन किसी काम में नहीं,
बस मोबाइल में।

वो ग्राहक
बिना कुछ खरीदे लौट गया।
आजकल वैसे भी
काम कम है।
जो कभी–कभार
कोई आता है,
वो भी
ऐसे ही लौट जाए,
तो मन में
एक अजीब–सी बात
रह जाती है।

मोबाइल की यह आदत
धीरे–धीरे
ध्यान चुरा लेती है।
कई बार
दुकान खुली होती है,
सामान सामने होता है,
लेकिन मन
स्क्रीन के अंदर कहीं
भटका रहता है।

बाद में सोचता हूँ
कि मैं मोबाइल में
आख़िर कर क्या रहा था?
कोई बड़ा काम नहीं,
कोई खास नतीजा नहीं।
बस समय निकल गया।

मोबाइल ज़रूरी है,
इससे इंकार नहीं।
काम के लिए भी,
जानकारी के लिए भी।
लेकिन शायद
इतना ज़रूरी भी नहीं
कि सामने खड़े ग्राहक से
ज़्यादा ध्यान
उसे दे दिया जाए।

आज यह बात
देर से समझ में आई।
जब दुकान वही थी,
सामान वही था,
लेकिन ग्राहक
नहीं रहा।

शायद
दुकानदारी में
सिर्फ दुकान पर बैठना
काफी नहीं होता।
वहाँ मौजूद रहना
भी ज़रूरी होता है।

आज
दुकान पर बैठा रहा,
लेकिन पूरी तरह
दुकान में नहीं था।
और यह एहसास
दिन ढलने के बाद
मन में
थोड़ा सा
चुभ गया।


इसी तरह के हमारे और भी ब्लॉग सकते है आप यह भी पढ़ें: दुकानदार का जीवन, दुकान में समान,


भीड़ में खोई आवाज – एक आम आदमी की चुप्पी की डायरी | मनघड़ंत बाते

भीड़ में खोई आवाज
कभी-कभी यह मन अजीब होता है।
और खुद ही बातें गढ़ लेता है,
खुद ही कहानियाँ बुनता है,
कभी गुस्से से भर जाता है,
तो कभी मोहब्बत में पिघल जाता है।

ये मन…
किसी की सुनता नहीं,
बस अपनी मनगढ़ंत बातें करता रहता है।
कुछ सुनी, कुछ देखी, कुछ खुद की बनाई—
यह सब अपने अंदर ही घोंटता रहता है।


मन की खामोशी

मैं कभी लाइन में खड़ा होता हूँ—
और कोई अचानक आगे घुस कर पूरे नियम तोड़ देता है।

गुस्सा आता है।
बहुत आता है।

पर क्या कर पाता हूँ?
कुछ नहीं।
सिर्फ मन-ही-मन कोसते हुए पीछे खिसक जाता हूँ।


सॉरी का बोझ और थोप दी गई शांति

कभी कोई धक्का मार जाता है,
टक्कर दे जाता है,
और बस एक “सॉरी” कहकर निकल जाता है—

जैसे उस एक शब्द ने
बस सब ठीक कर दिया हो,
जैसे मेरी तकलीफ़, मेरी जगह, मेरी इज़्ज़त
अब उसकी मर्ज़ी पर चल रही हो।


छोटी-छोटी शर्म, बड़े-बड़े घाव

किसी सड़क पर कोई गंदी गाली दे देता है,
बिना वजह, बिना सोच…
जैसे हम इंसान नहीं,
बस कोई चलती-फिरती चीज़ हैं।

और हद तो तब होती है,
जब एक छोटी लड़की भी लेडीज़ सीट के नाम पर
अकड़ कर खड़ा कर देती है—
ना शर्म, ना लाज,
सिर्फ अधिकार का गलत अर्थ।

और गुस्सा?
वो मन में ही रह जाता है।


सड़क की बदतमीज़ियाँ और हमारी मजबूरियाँ

बिना कानों में ईयरफ़ोन लगाए
मोबाइल पर तेज़ गाना बजाने वाले लोग,
बस स्टैंड पर गुटका थूक कर
दूसरों के कपड़ों पर छींटे गिरा देने वाले,
मेट्रो में धक्का देकर निकल जाने वाले…
इन सबके सामने हम बस खड़े रह जाते हैं।

जब गुस्सा आता है,
पर बोलते नहीं।
शब्द गले में उलझ कर रह जाते हैं।


सिस्टम में फंसा एक आम आदमी

पुलिस स्टेशन में FIR कराने जाओ
तो चक्कर पर चक्कर।
कोर्ट में तारीख़ पर तारीख़।
पुलिस वाला “चालन” की जगह
जेब में नोट रख ले,
और पूछो तो जवाब—
“चुपचाप निकलो।”

डीटीसी बस का कंडक्टर
पूरे पैसे लेकर भी टिकट न दे
और बोले—
“बैठ जाओ, आराम से उतर जाना…”
तो मन में फिर वही सवाल—
हम गलत हैं या सिस्टम?


मन की मनगढ़ंत बातें असल में मन की सच्चाई हैं

लोग कहते हैं मन बातें गढ़ता है।
लेकिन क्या यह गढ़ना है—
या हमारे समाज की सच्चाई?

यह मन जो बोल नहीं पाता,
वो भीतर नोट करता जाता है—
हर धक्का, हर अपमान,
हर अन्याय, हर चुप्पी।

हम आम लोग हैं।
ज्यादा कुछ समझ नहीं आता।
बस इतना पता है कि
हम गलत नहीं हैं—
बस अकेले हैं।


निष्कर्ष – मन क्यों गढ़ता है बातें?

क्योंकि बाहर की दुनिया
हमारी बात सुनने के लिए तैयार नहीं।

इसलिए मन अपने भीतर
एक दूसरा संसार बना लेता है—
जहाँ गुस्सा बोल सकता है,
जहाँ दुख रो सकता है,
जहाँ इज़्ज़त मरम्मत पा सकती है।

मन की मनगढ़ंत बातें
असल में झूठ नहीं,
वो हमारे सच का दूसरा नाम हैं।


अगर आप भी ऐसा महसूस करते हैं

तो जान लीजिए—
आप अकेले नहीं।
हम बहुत हैं।
बस भीड़ में खोई आवाज


यह भी पढ़ें : मन की मनघड़ंत बाते

New India 2026 – जो भारत बदल रहा है, वही भारत उभर रहा है


New India 2026 – जो भारत बदल रहा है, वही भारत उभर रहा है

New India 2026 भारत बदल रहा है — और यह बदलाव सिर्फ सरकार, तकनीक या नीतियाँ नहीं कर रहीं,
बल्कि लोगों की सोच, काम करने का तरीका और सपनों का स्तर बदल रहा है।

2026 तक भारत में कई ऐसी चीज़ें तेज़ी से उभरेंगी जो अब “भविष्य” नहीं बल्कि यथार्थ बन रही हैं।

यह ब्लॉग 2026 के उस भारत को समझने की कोशिश है
जिसकी धड़कनें आज ही सुनाई दे रही हैं।


1️⃣ Micro-Entrepreneur India – नौकरी नहीं, खुद का रास्ता

अब हर कोई नौकरी का इंतज़ार नहीं करना चाहता।
2026 में छोटे स्तर पर शुरू होने वाले बिज़नेस
मिनी ब्रांड बन जाएंगे।

  • घर से कारोबार
  • व्हाट्सऐप शॉप्स
  • इंस्टाग्राम पर लोकल प्रोडक्ट पेज
  • QR कोड से पेमेंट

नया नियम:
📌 नौकरी ढूंढने से पहले, कमाई ढूंढो
📌 दुकान नहीं, डिजिटल पहचान बनाओ


2️⃣ Skill India 2.0 – डिग्री नहीं, दक्षता

कंपनियाँ अब पूछेंगी:
“कितना जानते हो?”
न कि “कहाँ से पढ़े हो?”

2026 की भर्ती का असली आधार:
✔️ पोर्टफोलियो
✔️ प्रैक्टिकल नॉलेज
✔️ 3-6 महीने के स्किल कोर्स

ट्रेन्डिंग स्किल्स:

  • AI Writing + Prompting
  • Video Editing
  • Voiceover + Podcast Skills
  • Social Media Management
  • Basic Coding + Automation
  • Digital Retail Skills

3️⃣ Creator Economy Boom – हर शहर में एक कंटेंट उद्यमी

कंटेंट अब सिर्फ एंटरटेन नहीं करता,
बनाता है करियर।

2026 में:
✦ छोटे यूट्यूबर्स (10k से कम) भी कमाएंगे
✦ क्षेत्रीय भाषा कंटेंट सेंटर स्टेज पर होगा
✦ Micro niche creators = ब्रांड्स की demand

नया फॉर्मूला:

Audience छोटी हो सकती है
लेकिन Impact बड़ा होना चाहिए।

4️⃣ AI + Local India – तकनीक और भाषा का संगम

AI अब अंग्रेज़ी की चीज़ नहीं।
2026 में AI बोलेगा:

  • हिंदी
  • भोजपुरी
  • अवधी
  • मराठी
  • गुजराती
  • तमिल, तेलुगु…

यह भारत को देगा:
✔️ Accessibility
✔️ Ease of learning
✔️ कम लागत में स्मार्ट समाधान

कल्पना कीजिए:
गाँव का व्यक्ति बोले और AI डॉक्यूमेंट लिख दे।
यह अब कल्पना नहीं — आने वाला यथार्थ है।


5️⃣ Green India – नया बिज़नेस, नई आदत, नई अर्थव्यवस्था

2026 में पर्यावरण सिर्फ “टॉपिक” नहीं—
मार्केट होगा।

  • EV वाहनों की तेज़ बढ़त
  • सोलर पैनल घरों में
  • Refill Shops & Reuse Tools
  • Waste Recycling = Income

लाभ:
💰 बचत + कमाई
🌍 पर्यावरणिक संतुलन
🚴 जीवनशैली में सुधार


6️⃣ मानसिक सेहत = असली संपत्ति

2026 में “काम” से ज्यादा चर्चा होगी:
मन कैसा है?

  • Therapy apps
  • Meditation + Journaling
  • Emotional Literacy
  • Self Care Ecosystem

लोग समझेंगे:
“जिंदगी पैसे के लिए नहीं,
पैसा जिंदगी के लिए है।”


7️⃣ Bharat Retail Upgrade – छोटा दुकानदार भी ब्रांड बनेगा

QR और डिजिटल पेमेंट ने रास्ता खोल दिया है।
अब दुकानदार सिर्फ
“दुकान वाला” नहीं,
“उद्यमी” कहलाएगा।

2026 में:
📦 WhatsApp Catalog = आपकी दुकान
📍 Google Maps Review = आपकी छवि
🛒 Local Delivery = आपकी पहचान


New India का नया Mindset (2026)


“मैं लायक़ हूँ, और मैं बनाऊँगा।”

यह वाक्य 2026 के भारत की नसों में दौड़ेगा।


Conclusion – भारत बदलता नहीं, उभरता है

New India 2026 कोई सपना नहीं,
एक प्रक्रिया है —
जो आज से शुरू हो चुकी है।

  • सोच बदलेगी
  • अवसर बढ़ेंगे
  • रास्ते नए बनेंगे

और इस बार —
भारत दौड़ नहीं रहा,
भारतीय दौड़ रहे हैं।


यह भी पढ़ें: Change

डिस्ट्रैक्शन कैसे कम करे? पढ़ाई और लक्ष्य पर फोकस बनाने का व्यावहारिक गाइड

डिस्ट्रैक्शन कैसे कम करे बार-बार यही सवाल क्यों करते हैं?

आज बहुत सारे बच्चे और स्टूडेंट एक ही सवाल पूछते हैं —
डिस्ट्रैक्शन कैसे कम करे?

फोन, सोशल मीडिया, आलस, नींद और मन की बेचैनी पढ़ाई के बीच बार-बार आ जाती है।
लेकिन सच्चाई यह है कि डिस्ट्रैक्शन को पूरी तरह हटाया नहीं जा सकता।
डिस्ट्रैक्शन रहेगा ही।

असल सवाल यह नहीं है कि डिस्ट्रैक्शन क्यों आता है,
असल सवाल यह है कि उसके बावजूद काम कैसे किया जाए।

डिस्ट्रैक्शन का एक ही इलाज क्यों है?

हम जितना समय डिस्ट्रैक्शन में बर्बाद करते हैं,
उतना ही समय हमें अपने काम में जानबूझकर और ज्यादा गहराई से लगाना होगा।

अगर डिस्ट्रैक्शन की वजह से पढ़ाई कम हुई है,
तो उसका इलाज यह नहीं है कि फोन फेंक दिया जाए,
बल्कि यह है कि उसी काम को उस लेवल तक और उससे ज्यादा किया जाए।

इसके अलावा कोई दूसरा इलाज नहीं है।

अगर आप अपने गोल से बार-बार दूर जा रहे हैं,
तो दो ही बातें हो सकती हैं:

या तो वह आपका असली गोल नहीं है

या फिर आप खुद उस गोल से भाग रहे हैं

डिस्ट्रैक्शन को कैसे कम करें: व्यवहारिक तरीके

डिस्ट्रैक्शन को कैसे कम करें, इसका जवाब बड़े भाषणों में नहीं है।
यह रोज़ की छोटी आदतों में छिपा है।

1. अपने काम की साफ प्लानिंग करें

दिन में क्या पढ़ना है, कितना पढ़ना है — यह पहले तय होना चाहिए।
बिना प्लान पढ़ाई करने बैठना खुद डिस्ट्रैक्शन को बुलाना है।

2. फोन को अपने काम का औजार बनाएं

फोन में वही सर्च हों जो आपके काम से जुड़े हों।
बेकार की सर्च हिस्ट्री खुद-ब-खुद दिमाग को भटकाती है।

3. बार-बार फोन देखने की आदत तोड़ें

हर नोटिफिकेशन जरूरी नहीं होता।
फोन देखने का समय तय करें, आदत नहीं।

4. एक समय में एक ही काम करें

मानसिक शांति जरूरी है, लेकिन काम को टुकड़ों में न बांटें।
पढ़ाई करते समय गाने न सुनें।
जब पढ़ें, तो सिर्फ पढ़ें।

नींद, आलस और शरीर का रोल

बहुत लोग पूछते हैं कि नींद कब तक आएगी?

अगर आप लगातार सही तरीके से पढ़ते हैं,
तो एक दिन नींद खुद टूटने लगती है और आलस कम हो जाता है।

शरीर को स्ट्रेच करें

40 मिनट पढ़ाई के बाद 20 मिनट टहलें

लंबे समय तक बैठे न रहें

शरीर सुस्त होगा तो दिमाग भी भटकेगा।

सीखने की आदत कैसे मजबूत करें?

डिस्ट्रैक्शन को कैसे कम करें, इसका सबसे मजबूत तरीका है
सीखने की आदत को लगातार बढ़ाना।

रोज़ कुछ नया सीखें

अपने आसपास की चीजों को समझने की कोशिश करें

सिर्फ किताब नहीं, माहौल से भी सीखें

जब सीखने में रुचि बढ़ती है,
तो डिस्ट्रैक्शन अपने-आप कमजोर होने लगता है।

खाने पर नियंत्रण क्यों जरूरी है?

बार-बार खाने के बारे में सोचना भी डिस्ट्रैक्शन है।
भारी और अनियमित भोजन दिमाग को सुस्त करता है।

हल्का, समय पर और सीमित भोजन
फोकस को बेहतर बनाता है।
स्टूडेंट्स के लिए जरूरी ऐफर्मेशन

अगर आप स्टूडेंट हैं,
तो नीचे दिए गए ऐफर्मेशन ध्यान से पढ़ें और रोज़ दोहराएं।

मैं पढ़ रहा हूँ

मुझे पढ़ना अच्छा लगता है

मुझे पढ़ते समय नींद नहीं आती

मुझे पढ़ते समय आलस नहीं आता

मुझे पढ़ने में मज़ा आता है

जब मैं पढ़ता हूँ, मेरा ध्यान कहीं नहीं जाता

मुझे एक बार पढ़ने पर अच्छी तरह समझ आता है

पढ़ते समय मुझे और जानने की इच्छा होती है

मुझे चीज़ें जल्दी याद हो जाती हैं

मैं पढ़ाई से बोर नहीं होता

मेरा ग्रुप पढ़ाई वाला है

मेरे दोस्त मेरी पढ़ाई में मदद करते हैं और मैं उनकी

ऐफर्मेशन तभी काम करते हैं
जब उनके साथ रोज़ का एक्शन जुड़ा हो।

निष्कर्ष: डिस्ट्रैक्शन से लड़ना नहीं, उसे पीछे छोड़ना है

डिस्ट्रैक्शन को कैसे कम करें —
इसका जवाब यह नहीं है कि दुनिया बदल दी जाए।

इसका जवाब यह है कि
आप अपने काम को इतना मजबूत बना लें
कि डिस्ट्रैक्शन पीछे छूट जाए।

जब काम स्पष्ट होता है,
तो ध्यान अपने-आप बनने लगता है।

यह भी पढे: फोकस रखना खुद को, डिस्ट्रैक्शन से कैसे बचे,

खुद को बेहतर बनाए | हर साल लक्ष्य अधूरे क्यों रह जाते है?

हर साल लक्ष्य बनते हैं लेकिन पूरे नहीं हो पाते। यह ब्लॉग 2026 से पहले खुद को बेहतर बनाने, डिस्ट्रैक्शन कम करने और एक व्यवहारिक सिस्टम बनाने की ईमानदार कोशिश है।

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“होना क्या था” का मतलब क्या होता है? जब शब्द चुप हो जाते है।

“होना क्या था” का मतलब क्या होता है?

जब कोई पूछता है —
“क्या हुआ?”
और जवाब आता है —
“होना क्या था।”

तो यह जवाब हल्का नहीं होता।
असल में, “होना क्या था” का मतलब होता है —
बहुत कुछ हुआ है,
पर अब उसे कहने की जगह नहीं बची।

“होना क्या था” में छुपी चुप्पी

यह चुप्पी साधारण नहीं होती।
यह वो चुप्पी होती है
जो समझाने से थक चुकी होती है।

जब इंसान जानता है कि
बोलने से बात सुधरेगी नहीं,
तो वह चुप रहना चुनता है।

इसी चुप्पी से निकलता है —
“होना क्या था।”

दबा हुआ गुस्सा, जो बाहर नहीं आता

“होना क्या था”
गुस्से का धमाका नहीं है,
यह गुस्से का थक जाना है।

यह गुस्सा:

लड़ना नहीं चाहता

सफ़ाई नहीं देना चाहता

खुद को और नहीं थकाना चाहता


इसलिए वह अंदर ही बैठ जाता है।

छुपा हुआ दर्द जो बाहर नहीं निकलता

अक्सर यह दर्द नया नहीं होता।
यह वही दर्द होता है
जो पहले भी आया था,
और हर बार बिना आवाज़ के सह लिया गया।

जब दर्द आदत बन जाता है,
तो इंसान शिकायत छोड़ देता है।

तब वह बस कह देता है —
“होना क्या था।”

क्या यह हिम्मत की कमी है?

नहीं।

कई बार यह जवाब
हिम्मत की कमी नहीं,
बल्कि भावनात्मक थकान का संकेत होता है।

हर बार लड़ना ताक़त नहीं।
कभी-कभी चुप रहना
खुद को बचाने का तरीका होता है।

होना क्या था - जब शब्द चुप्पी बन जाए
होना क्या था


जब शब्द हार जाते हैं, आँसू बोलते हैं

जब जुबान साथ छोड़ देती है,
तो आँसू आगे आ जाते हैं।

आँसू:

बहस नहीं करते

जवाब नहीं माँगते

सफ़ाई नहीं देते

वे बस यह बताते हैं
कि अंदर बहुत कुछ है
जो कहा नहीं जा सका।

असल में
“होना क्या था” का मतलब
सिर्फ़ शब्दों में नहीं है।

यह उस हालत का नाम है
जहाँ इंसान सामने वाले को देखता है,
पर उसे सुरक्षित महसूस नहीं करता।

इसलिए बात
वाक्य बनकर नहीं,
चुप्पी बनकर बाहर आती है।

आख़िरी बात

कुछ बातें कही नहीं जातीं,
बस सह ली जाती हैं।

और जब कोई फिर पूछता है —
“क्या हुआ?”

तो जवाब बनकर निकलता है।

यह भी पढे: उलझ , युवा मन की उलझने, मौन का अवलोकन, शब्दों में सहजता, एक उम्मीद

कुछ दिन मैं चलता तो रहता हूं, पर क्यों बार बार रुक जाता हूं? एक अंतहीन संघर्ष

कुछ दिन ऐसे होते हैं जब मैं पूरे मन से काम करता हूँ।
मन में स्पष्टता होती है, ऊर्जा बह रही होती है, और लगता है जैसे रास्ता साफ़ दिखाई दे रहा हो।
काम में आनंद आता है, समय का पता ही नहीं चलता, और भीतर कहीं यह विश्वास भी जागता है कि इस बार सफ़र पूरा होगा।

लेकिन फिर…
अचानक सब बदल जाता है।

काम में मन नहीं लगता।
वही काम, वही लक्ष्य, वही परिस्थितियाँ—
पर भीतर कुछ ठहर सा जाता है।
कभी आलस मुझे घेर लेता है,
तो कभी मन में यह शंका उठने लगती है कि शायद मेरी कुंडली में ही ऐसा कोई योग है
जो हर बार मुझे मंज़िल के करीब लाकर रोक देता है।

क्या यह ग्रहों की चाल है या मन का बोझ?

कभी-कभी लगता है जैसे जीवन मेरे सामने बार-बार वही पैटर्न दोहरा रहा हो।
सफ़र शुरू होता है, गति बनती है, उम्मीदें जगती हैं—
और फिर अचानक सब धीमा पड़ जाता है।
मंज़िल पास दिखती है, लेकिन हाथ नहीं आती।

तभी मन पूछता है—
क्या यह सब ग्रहों की चाल है?
क्या सच में कोई ऐसी शक्ति है जो रास्ते में अड़चन बनकर खड़ी हो जाती है?

या फिर यह केवल मेरी मानसिक थकान है,
जिसे मैं आलस या भाग्य का नाम दे देता हूँ?

जब संघर्ष खत्म होने का नाम नहीं लेता

जीवन में ऐसा दौर भी आता है जब लगता है कि संघर्ष कभी समाप्त ही नहीं होगा।
एक मुश्किल खत्म होती है, तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है।
कभी आर्थिक दबाव,
कभी मानसिक उलझन,
कभी भविष्य की चिंता।

इन सबके बीच यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि
क्या करूँ और क्या न करूँ।
रास्ते धुंधले पड़ जाते हैं,
निर्णय भारी लगने लगते हैं,
और भीतर का आत्मविश्वास चुपचाप थक जाता है।

फिर भी हार क्यों नहीं मानता?

इन सबके बावजूद एक बात है जो मुझे आज भी आगे बढ़ने से रोक नहीं पाती—
हार मान लेने का विचार।

भले ही मैं रुक जाता हूँ,
भले ही गति धीमी हो जाती है,
लेकिन मैं पूरी तरह ठहरता नहीं हूँ।

क्योंकि कहीं न कहीं भीतर यह विश्वास अब भी ज़िंदा है
कि अगर मैं चलता रहूँगा,
तो एक दिन यह सफ़र पूरा होगा।

शायद मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता सीधा नहीं है।
शायद मेरे लिए रुक-रुक कर चलना ही लिखा है।
लेकिन चलना—
यह मैंने छोड़ना नहीं सीखा।

शायद यही मेरा स्वभाव है

अब धीरे-धीरे यह समझ आने लगा है कि
हर इंसान का संघर्ष एक-सा नहीं होता।
कुछ लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं,
तो कुछ लोग ठहर-ठहर कर।

शायद मेरा रास्ता भी ऐसा ही है—
जहाँ रुकना कमजोरी नहीं,
बल्कि अगली चाल की तैयारी है।

और यही सोच मुझे फिर से खड़ा कर देती है।

🧾 अंतिम शब्द

अगर आप भी कभी अपने आप कुछ दिन वाली स्थिति में पाते हैं—
जहाँ मेहनत के बाद भी ठहराव आ जाता है,
जहाँ मन सवाल करता है,
जहाँ संघर्ष थकाने लगता है—

तो याद रखिए,
रुक जाना हार नहीं है।
हार तब होती है, जब हम आगे बढ़ना छोड़ देते हैं।

और जब तक आप चल रहे हैं—
भले ही धीरे,
भले ही रुक-रुक कर—
तब तक सफ़र ज़िंदा है।

यह भी पढे: सवाल उठ रहे है, सपनों को पूरा करे, खुद से करे सवाल,

BOHO BAZAAR | दिल्ली के शोर में रंगों की एक खुली सांस

Boho Bazaar: दिल्ली के शोर में रंगों की एक खुली सांस

शहर जब रोज़ की रफ़्तार से थक जाता है,
तो कहीं न कहीं एक जगह बनती है—
जहाँ लोग खरीदने से पहले महसूस करने आते हैं।
Boho Bazaar वही जगह है।
लाल टेंट्स की कतारें, खुला आसमान, हल्की धुंध में छनती धूप
और कदमों के साथ बहता हुआ शोर—
यह बाज़ार नहीं, एक अनुभव है।

कदम रखते ही… रास्ते नहीं, कहानियाँ खुलती हैं

भीड़ सीधी नहीं चलती।
कभी रुकती है, कभी मुड़ती है—
किसी स्टॉल पर, किसी रंग पर, किसी आवाज़ पर।
यहाँ रास्ते तय नहीं होते,
यहाँ नज़रें तय करती हैं कि अगला मोड़ कहाँ है।

छोटी चीज़ें, बड़ा एहसास

एक कोने में पीले फूल—काग़ज़ पर सजे, जैसे किसी ने धूप को पकड़ लिया हो।
दूसरे कोने में handmade jewellery—
धातु नहीं, हाथों की मेहनत चमक रही है।
और कहीं अगरबत्तियाँ—
जिनकी खुशबू बताती है कि सुकून खरीदा नहीं, पाया जाता है।

त्योहारों का रंग, शहर की चाल

Christmas की झलक हर तरफ़—
कार्ड्स, स्टिकर्स, छोटे-छोटे गिफ्ट्स,
और वो मुस्कानें जो सिर्फ़ इस मौसम में दिखती हैं।
यहाँ त्योहार दीवारों पर नहीं टंगे,
लोगों में चलते हैं।

कपड़े, कला और अपनी पहचान

एक कतार में knitwear,
दूसरी में illustrations और posters—
दिल्ली की हँसी, तंज़, और रोज़मर्रा की कहानियाँ
काग़ज़ पर उतर आई हैं।
यहाँ फैशन ट्रेंड नहीं बनता,
यहाँ खुद होना ट्रेंड है।

भीड़ भी यहाँ किरदार है

कोई bargain में उलझा है,
कोई बस देख रहा है,
कोई हाथ में थैला लिए मुस्कुरा रहा है।
Boho Bazaar में लोग दर्शक नहीं,
कहानी के हिस्से होते हैं।

खुला मैदान, खुला मन

बीच-बीच में खुली जगह—
जहाँ बैठकर साँस ली जा सके।
यहीं समझ आता है कि
शहर की भाग-दौड़ में भी
रुकना एक कला है।

अंत में…

Boho Bazaar से आप
एक जैकेट, एक पोस्टर, या एक छोटा-सा गिफ्ट लेकर निकलते हैं।
लेकिन अगर ध्यान दें,
तो साथ में ये एहसास भी ले जाते हैं—
कि ज़िंदगी सिर्फ़ जल्दी में नहीं चलती,
कभी-कभी रंगों के बीच धीरे चलना भी ज़रूरी है।

यह भी पढे: ट्रैड फेयर, IITF 2025, mere ek din ka safar,

आलस आराम का भ्रम और लक्ष्य से बढ़ती दूरी|एक आत्मचिंतक ब्लॉग

आलस आराम का भ्रम और लक्ष्य से बढ़ती दूरी कभी-कभी आलस बहुत बढ़ जाता है।
ऐसा नहीं कि शरीर बहुत थका हुआ होता है, बल्कि मन धीरे से कहता है — अभी कुछ मत करो, थोड़ा सो लो, थोड़ा आराम कर लो।

जब करने को कोई काम नहीं होता, तब यह भावना और भी गहरी हो जाती है। सोने का मन करता है, और फिर सिर्फ़ थोड़ी देर नहीं, बल्कि बहुत देर तक सोने का। उस समय यह सोना आराम जैसा लगता है, लेकिन बाद में सवाल उठता है — क्या उस सोने का सच में कोई फायदा हुआ?

अक्सर कहा जाता है कि जो सोता है वह खोता है और जो जागता है वह पाता है। यह बात सुनने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सच्चाई छुपी होती है। जागना सिर्फ़ नींद से उठना नहीं होता, जागना अपने जीवन और अपने उद्देश्य के प्रति सजग होना होता है।

लेकिन आलस यही नहीं होने देता।
वह मन के भीतर सवाल खड़ा करता है — क्या ही मिल जाएगा जागकर, क्या फर्क पड़ेगा अगर थोड़ी देर और सो लिया जाए? यह “थोड़ी देर” धीरे-धीरे रोज़ की आदत बन जाती है।

समस्या यह नहीं है कि हम कभी-कभी आराम कर लेते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब वही आराम हमारी दिनचर्या बन जाता है। तब आलस सिर्फ़ शरीर तक सीमित नहीं रहता, वह हमारे विचारों और निर्णयों पर भी असर डालने लगता है।

धीरे-धीरे हम अपने लक्ष्य से दूर होने लगते हैं। पहले लक्ष्य बस थोड़े धुंधले दिखाई देते हैं, फिर वे दूर खिसकने लगते हैं। एक समय ऐसा आता है जब लक्ष्य के बारे में सोचना भी भारी लगने लगता है, और हम खुद को यह कहकर समझा लेते हैं कि शायद यह हमारे बस की बात ही नहीं थी।

असल में उस समय हम लक्ष्य से नहीं, बल्कि अपने आलस से हार चुके होते हैं।

आलस हमारे और हमारे लक्ष्य के बीच एक रुकावट बन जाता है। वह हमें रोकता नहीं, बस धीमा करता है, और यही धीमापन सबसे खतरनाक होता है। क्योंकि हमें लगता है कि हम रुके नहीं हैं, जबकि सच्चाई यह होती है कि हम आगे बढ़ ही नहीं रहे होते।

इसलिए आलस पर जीत हासिल करना ज़रूरी है। इसका मतलब यह नहीं कि खुद पर ज़ोर ज़बरदस्ती की जाए, बल्कि इतना भर समझा जाए कि हर बार आलस की बात मान लेना हमें अपने लक्ष्य से एक कदम और दूर ले जाता है।

जब भी आलस कहे कि अभी मत उठो, तब बस इतना याद रखना चाहिए कि उठना किसी चमत्कार की शुरुआत नहीं करता, लेकिन न उठना निश्चित रूप से दूरी बढ़ा देता है।

अंत में बात सीधी है —
आलस आराम का नाम नहीं है, यह एक ऐसा भ्रम है जो हमें यह महसूस ही नहीं होने देता कि हम धीरे-धीरे अपने ही लक्ष्य से दूर होते जा रहे हैं। अगर हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचना है, तो इस रुकावट को पहचानना और इससे बाहर निकलना ज़रूरी है।


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