हर साल लक्ष्य बनते हैं लेकिन पूरे नहीं हो पाते। यह ब्लॉग 2026 से पहले खुद को बेहतर बनाने, डिस्ट्रैक्शन कम करने और एक व्यवहारिक सिस्टम बनाने की ईमानदार कोशिश है।
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“होना क्या था” का मतलब क्या होता है? जब शब्द चुप हो जाते है।
“होना क्या था” का मतलब क्या होता है?
जब कोई पूछता है —
“क्या हुआ?”
और जवाब आता है —
“होना क्या था।”
तो यह जवाब हल्का नहीं होता।
असल में, “होना क्या था” का मतलब होता है —
बहुत कुछ हुआ है,
पर अब उसे कहने की जगह नहीं बची।
“होना क्या था” में छुपी चुप्पी
यह चुप्पी साधारण नहीं होती।
यह वो चुप्पी होती है
जो समझाने से थक चुकी होती है।
जब इंसान जानता है कि
बोलने से बात सुधरेगी नहीं,
तो वह चुप रहना चुनता है।
इसी चुप्पी से निकलता है —
“होना क्या था।”
दबा हुआ गुस्सा, जो बाहर नहीं आता
“होना क्या था”
गुस्से का धमाका नहीं है,
यह गुस्से का थक जाना है।
यह गुस्सा:
लड़ना नहीं चाहता
सफ़ाई नहीं देना चाहता
खुद को और नहीं थकाना चाहता
इसलिए वह अंदर ही बैठ जाता है।
छुपा हुआ दर्द जो बाहर नहीं निकलता
अक्सर यह दर्द नया नहीं होता।
यह वही दर्द होता है
जो पहले भी आया था,
और हर बार बिना आवाज़ के सह लिया गया।
जब दर्द आदत बन जाता है,
तो इंसान शिकायत छोड़ देता है।
तब वह बस कह देता है —
“होना क्या था।”
क्या यह हिम्मत की कमी है?
नहीं।
कई बार यह जवाब
हिम्मत की कमी नहीं,
बल्कि भावनात्मक थकान का संकेत होता है।
हर बार लड़ना ताक़त नहीं।
कभी-कभी चुप रहना
खुद को बचाने का तरीका होता है।

जब शब्द हार जाते हैं, आँसू बोलते हैं
जब जुबान साथ छोड़ देती है,
तो आँसू आगे आ जाते हैं।
आँसू:
बहस नहीं करते
जवाब नहीं माँगते
सफ़ाई नहीं देते
वे बस यह बताते हैं
कि अंदर बहुत कुछ है
जो कहा नहीं जा सका।
असल में
“होना क्या था” का मतलब
सिर्फ़ शब्दों में नहीं है।
यह उस हालत का नाम है
जहाँ इंसान सामने वाले को देखता है,
पर उसे सुरक्षित महसूस नहीं करता।
इसलिए बात
वाक्य बनकर नहीं,
चुप्पी बनकर बाहर आती है।
आख़िरी बात
कुछ बातें कही नहीं जातीं,
बस सह ली जाती हैं।
और जब कोई फिर पूछता है —
“क्या हुआ?”
तो जवाब बनकर निकलता है।
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कुछ दिन मैं चलता तो रहता हूं, पर क्यों बार बार रुक जाता हूं? एक अंतहीन संघर्ष
कुछ दिन ऐसे होते हैं जब मैं पूरे मन से काम करता हूँ।
मन में स्पष्टता होती है, ऊर्जा बह रही होती है, और लगता है जैसे रास्ता साफ़ दिखाई दे रहा हो।
काम में आनंद आता है, समय का पता ही नहीं चलता, और भीतर कहीं यह विश्वास भी जागता है कि इस बार सफ़र पूरा होगा।
लेकिन फिर…
अचानक सब बदल जाता है।
काम में मन नहीं लगता।
वही काम, वही लक्ष्य, वही परिस्थितियाँ—
पर भीतर कुछ ठहर सा जाता है।
कभी आलस मुझे घेर लेता है,
तो कभी मन में यह शंका उठने लगती है कि शायद मेरी कुंडली में ही ऐसा कोई योग है
जो हर बार मुझे मंज़िल के करीब लाकर रोक देता है।
क्या यह ग्रहों की चाल है या मन का बोझ?
कभी-कभी लगता है जैसे जीवन मेरे सामने बार-बार वही पैटर्न दोहरा रहा हो।
सफ़र शुरू होता है, गति बनती है, उम्मीदें जगती हैं—
और फिर अचानक सब धीमा पड़ जाता है।
मंज़िल पास दिखती है, लेकिन हाथ नहीं आती।
तभी मन पूछता है—
क्या यह सब ग्रहों की चाल है?
क्या सच में कोई ऐसी शक्ति है जो रास्ते में अड़चन बनकर खड़ी हो जाती है?
या फिर यह केवल मेरी मानसिक थकान है,
जिसे मैं आलस या भाग्य का नाम दे देता हूँ?
जब संघर्ष खत्म होने का नाम नहीं लेता
जीवन में ऐसा दौर भी आता है जब लगता है कि संघर्ष कभी समाप्त ही नहीं होगा।
एक मुश्किल खत्म होती है, तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है।
कभी आर्थिक दबाव,
कभी मानसिक उलझन,
कभी भविष्य की चिंता।
इन सबके बीच यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि
क्या करूँ और क्या न करूँ।
रास्ते धुंधले पड़ जाते हैं,
निर्णय भारी लगने लगते हैं,
और भीतर का आत्मविश्वास चुपचाप थक जाता है।
फिर भी हार क्यों नहीं मानता?
इन सबके बावजूद एक बात है जो मुझे आज भी आगे बढ़ने से रोक नहीं पाती—
हार मान लेने का विचार।
भले ही मैं रुक जाता हूँ,
भले ही गति धीमी हो जाती है,
लेकिन मैं पूरी तरह ठहरता नहीं हूँ।
क्योंकि कहीं न कहीं भीतर यह विश्वास अब भी ज़िंदा है
कि अगर मैं चलता रहूँगा,
तो एक दिन यह सफ़र पूरा होगा।
शायद मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता सीधा नहीं है।
शायद मेरे लिए रुक-रुक कर चलना ही लिखा है।
लेकिन चलना—
यह मैंने छोड़ना नहीं सीखा।
शायद यही मेरा स्वभाव है
अब धीरे-धीरे यह समझ आने लगा है कि
हर इंसान का संघर्ष एक-सा नहीं होता।
कुछ लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं,
तो कुछ लोग ठहर-ठहर कर।
शायद मेरा रास्ता भी ऐसा ही है—
जहाँ रुकना कमजोरी नहीं,
बल्कि अगली चाल की तैयारी है।
और यही सोच मुझे फिर से खड़ा कर देती है।
🧾 अंतिम शब्द
अगर आप भी कभी अपने आप कुछ दिन वाली स्थिति में पाते हैं—
जहाँ मेहनत के बाद भी ठहराव आ जाता है,
जहाँ मन सवाल करता है,
जहाँ संघर्ष थकाने लगता है—
तो याद रखिए,
रुक जाना हार नहीं है।
हार तब होती है, जब हम आगे बढ़ना छोड़ देते हैं।
और जब तक आप चल रहे हैं—
भले ही धीरे,
भले ही रुक-रुक कर—
तब तक सफ़र ज़िंदा है।
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BOHO BAZAAR | दिल्ली के शोर में रंगों की एक खुली सांस
Boho Bazaar: दिल्ली के शोर में रंगों की एक खुली सांस
शहर जब रोज़ की रफ़्तार से थक जाता है,
तो कहीं न कहीं एक जगह बनती है—
जहाँ लोग खरीदने से पहले महसूस करने आते हैं।
Boho Bazaar वही जगह है।
लाल टेंट्स की कतारें, खुला आसमान, हल्की धुंध में छनती धूप
और कदमों के साथ बहता हुआ शोर—
यह बाज़ार नहीं, एक अनुभव है।
कदम रखते ही… रास्ते नहीं, कहानियाँ खुलती हैं
भीड़ सीधी नहीं चलती।
कभी रुकती है, कभी मुड़ती है—
किसी स्टॉल पर, किसी रंग पर, किसी आवाज़ पर।
यहाँ रास्ते तय नहीं होते,
यहाँ नज़रें तय करती हैं कि अगला मोड़ कहाँ है।
छोटी चीज़ें, बड़ा एहसास
एक कोने में पीले फूल—काग़ज़ पर सजे, जैसे किसी ने धूप को पकड़ लिया हो।
दूसरे कोने में handmade jewellery—
धातु नहीं, हाथों की मेहनत चमक रही है।
और कहीं अगरबत्तियाँ—
जिनकी खुशबू बताती है कि सुकून खरीदा नहीं, पाया जाता है।
त्योहारों का रंग, शहर की चाल
Christmas की झलक हर तरफ़—
कार्ड्स, स्टिकर्स, छोटे-छोटे गिफ्ट्स,
और वो मुस्कानें जो सिर्फ़ इस मौसम में दिखती हैं।
यहाँ त्योहार दीवारों पर नहीं टंगे,
लोगों में चलते हैं।
कपड़े, कला और अपनी पहचान
एक कतार में knitwear,
दूसरी में illustrations और posters—
दिल्ली की हँसी, तंज़, और रोज़मर्रा की कहानियाँ
काग़ज़ पर उतर आई हैं।
यहाँ फैशन ट्रेंड नहीं बनता,
यहाँ खुद होना ट्रेंड है।
भीड़ भी यहाँ किरदार है
कोई bargain में उलझा है,
कोई बस देख रहा है,
कोई हाथ में थैला लिए मुस्कुरा रहा है।
Boho Bazaar में लोग दर्शक नहीं,
कहानी के हिस्से होते हैं।
खुला मैदान, खुला मन
बीच-बीच में खुली जगह—
जहाँ बैठकर साँस ली जा सके।
यहीं समझ आता है कि
शहर की भाग-दौड़ में भी
रुकना एक कला है।
अंत में…
Boho Bazaar से आप
एक जैकेट, एक पोस्टर, या एक छोटा-सा गिफ्ट लेकर निकलते हैं।
लेकिन अगर ध्यान दें,
तो साथ में ये एहसास भी ले जाते हैं—
कि ज़िंदगी सिर्फ़ जल्दी में नहीं चलती,
कभी-कभी रंगों के बीच धीरे चलना भी ज़रूरी है।
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आलस आराम का भ्रम और लक्ष्य से बढ़ती दूरी|एक आत्मचिंतक ब्लॉग
आलस आराम का भ्रम और लक्ष्य से बढ़ती दूरी कभी-कभी आलस बहुत बढ़ जाता है।
ऐसा नहीं कि शरीर बहुत थका हुआ होता है, बल्कि मन धीरे से कहता है — अभी कुछ मत करो, थोड़ा सो लो, थोड़ा आराम कर लो।
जब करने को कोई काम नहीं होता, तब यह भावना और भी गहरी हो जाती है। सोने का मन करता है, और फिर सिर्फ़ थोड़ी देर नहीं, बल्कि बहुत देर तक सोने का। उस समय यह सोना आराम जैसा लगता है, लेकिन बाद में सवाल उठता है — क्या उस सोने का सच में कोई फायदा हुआ?
अक्सर कहा जाता है कि जो सोता है वह खोता है और जो जागता है वह पाता है। यह बात सुनने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सच्चाई छुपी होती है। जागना सिर्फ़ नींद से उठना नहीं होता, जागना अपने जीवन और अपने उद्देश्य के प्रति सजग होना होता है।
लेकिन आलस यही नहीं होने देता।
वह मन के भीतर सवाल खड़ा करता है — क्या ही मिल जाएगा जागकर, क्या फर्क पड़ेगा अगर थोड़ी देर और सो लिया जाए? यह “थोड़ी देर” धीरे-धीरे रोज़ की आदत बन जाती है।
समस्या यह नहीं है कि हम कभी-कभी आराम कर लेते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब वही आराम हमारी दिनचर्या बन जाता है। तब आलस सिर्फ़ शरीर तक सीमित नहीं रहता, वह हमारे विचारों और निर्णयों पर भी असर डालने लगता है।
धीरे-धीरे हम अपने लक्ष्य से दूर होने लगते हैं। पहले लक्ष्य बस थोड़े धुंधले दिखाई देते हैं, फिर वे दूर खिसकने लगते हैं। एक समय ऐसा आता है जब लक्ष्य के बारे में सोचना भी भारी लगने लगता है, और हम खुद को यह कहकर समझा लेते हैं कि शायद यह हमारे बस की बात ही नहीं थी।
असल में उस समय हम लक्ष्य से नहीं, बल्कि अपने आलस से हार चुके होते हैं।
आलस हमारे और हमारे लक्ष्य के बीच एक रुकावट बन जाता है। वह हमें रोकता नहीं, बस धीमा करता है, और यही धीमापन सबसे खतरनाक होता है। क्योंकि हमें लगता है कि हम रुके नहीं हैं, जबकि सच्चाई यह होती है कि हम आगे बढ़ ही नहीं रहे होते।
इसलिए आलस पर जीत हासिल करना ज़रूरी है। इसका मतलब यह नहीं कि खुद पर ज़ोर ज़बरदस्ती की जाए, बल्कि इतना भर समझा जाए कि हर बार आलस की बात मान लेना हमें अपने लक्ष्य से एक कदम और दूर ले जाता है।
जब भी आलस कहे कि अभी मत उठो, तब बस इतना याद रखना चाहिए कि उठना किसी चमत्कार की शुरुआत नहीं करता, लेकिन न उठना निश्चित रूप से दूरी बढ़ा देता है।
अंत में बात सीधी है —
आलस आराम का नाम नहीं है, यह एक ऐसा भ्रम है जो हमें यह महसूस ही नहीं होने देता कि हम धीरे-धीरे अपने ही लक्ष्य से दूर होते जा रहे हैं। अगर हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचना है, तो इस रुकावट को पहचानना और इससे बाहर निकलना ज़रूरी है।
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Overthinking रात में क्यों बढ़ जाती है | Overthinking से डर नहीं
Overthinking रात में ही क्यों बढ़ जाती है? दिन भर सब संभला रहता है।
काम, बातें, आवाज़ें, ज़िम्मेदारियाँ — सब कुछ हमें थामे रखता है।
लेकिन जैसे ही रात होती है,
कमरा शांत होता है,
मोबाइल साइलेंट पर जाता है,
और बत्ती बुझती है…
वैसे ही मन जाग जाता है।
जब वही बातें,
और वही डर,
वही सवाल —
जो दिन में हल्के लगते थे,
रात में भारी क्यों हो जाते हैं?
असल कारण क्या है?
रात ओवरथिंकिंग नहीं लाती।
बस रात सिर्फ परदा हटाती है।
दिन में हमारा मन व्यस्त रहता है —
काम में, बातचीत में, स्क्रोलिंग में।
हम सोचने से बचते रहते हैं।
लेकिन रात में कोई ध्यान भटकाने वाला शोर नहीं होता।
और जब बाहरी शोर खत्म होता है,
तो भीतर का शोर सुनाई देने लगता है।
रात हमारे भीतर छुपी बातों को बाहर ले आती है —
अधूरी इच्छाएँ,
दबी हुई नाराज़गी,
कहे-अनकहे शब्द,
और वो डर, जिनसे हम दिन में भागते रहते हैं।
रात और नियंत्रण का रिश्ता
दिन में हमें लगता है कि सब हमारे नियंत्रण में है।
लेकिन रात…
रात हमें याद दिलाती है कि
बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं है।
भविष्य का डर,
गलत फैसलों का पछतावा,
और “अगर ऐसा हो गया तो?” वाले सवाल
सब रात को ज़्यादा ताक़तवर लगते हैं।
क्योंकि रात में हम कमज़ोर नहीं होते,
बस ईमानदार होते हैं।
Overthinking डर से नहीं, असुरक्षा से जन्म लेती है
अक्सर लोग कहते हैं —
“तुम बहुत डरते हो इसलिए ओवरथिंक करते हो।”
लेकिन सच थोड़ा अलग है।
हम इसलिए ज़्यादा सोचते हैं
क्योंकि हम अपने जीवन को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं।
क्या मैं सही दिशा में जा रहा हूँ?
क्या मैं पीछे तो नहीं रह गया?
क्या लोग मुझे समझते हैं?
और क्या मैं काफी हूँ?
ये सवाल दिन में भी होते हैं,
बस रात में भागने का रास्ता बंद हो जाता है।
मन रात को समाधान नहीं, सुकून चाहता है
हम सोचते हैं कि
अगर रात भर सोच लेंगे तो हल निकल आएगा।
लेकिन मन रात में हल नहीं चाहता।
मन बस यह जानना चाहता है कि
कोई है जो उसे समझे।
जब हम रात में खुद से लड़ते हैं —
“सो जाओ”, “मत सोचो”, “ये बेकार है” —
तो Overthinking और बढ़ जाती है।
क्योंकि मन को दबाने से नहीं,
सुने जाने से शांति मिलती है।
स्पष्टता के कुछ बिंदु
रात में Overthinking होना असामान्य नहीं है
यह आपके कमजोर होने का प्रमाण नहीं
यह संकेत है कि दिन में आपने खुद को समय नहीं दिया
आपका मन थका हुआ है, टूटा हुआ नहीं
आपको जवाब नहीं, आराम चाहिए
एक छोटा दैनिक अभ्यास
सोने से पहले खुद से कोई सवाल हल करने की कोशिश मत कीजिए।
बस इतना कहिए —
“जो भी है, सुबह देखा जाएगा।”
अगर मन भटके,
तो उसे वापस लाने की ज़िम्मेदारी मत लीजिए।
उसे आने दीजिए,
और बिना जज किए जाने दीजिए।
कभी-कभी
मन को शांत करने का सबसे सरल तरीका
उसे लड़ने के लिए छोड़ देना होता है।
समापन वाक्य
रात आपकी दुश्मन नहीं है।
वह बस आपको वो दिखाती है
जो दिन में छुपा रहता है।
और जब आप उस सच से भागना बंद कर देते हैं,
तो ओवरथिंकिंग धीरे-धीरे
अपनी पकड़ ढीली कर देती है।
इस विषय से जुड़ी भावनात्मक स्थिति को समझने और संतुलित करने के लिए Antar OS का संबंधित टूल उपयोग में लाया जा सकता है।
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Overthinking Detox
🧘♂️ Overthinking Detox: Dimag ke shor ko shant karne ka 10-minute formula
✨ Intro
Kabhi dimag radio ki tarah ho jata hai— tum channel badalne ki koshish karte ho, shor apni zidd par hota hai.
Ye blog shor ko rokne ke liye nahi… tumhe uske upar uthna सिखाने के लिए है.
Bas 10 minutes.
Aur tumhara dimaag phir se tumhara ho sakta hai.
🌀 Why Overthinking Happens (SEO: why we overthink, overthinking meaning in Hindi)
Hum sab overthink karte hain— future, past, conversations, aur apne aap ke baare mein.
Overthinking sirf “soch” nahi hota.
Ye ek invisible weight hota hai jo saans tak bhaari kar deta hai.
Is blog ka intention simple hai:
tumhari clarity ko wapas ghar lautana.
⚠️ The Real Problem (SEO: symptoms of overthinking, real reason of overthinking)
Overthinking ka asli issue ye nahi ki tum zyada sochte ho.
Issue ye hai ki tum har soch ko sach samajhne lagte ho.
Mind ka formula simple hai:
Memory + Fear = Noise.
Aur hum is noise ko reality maan lete hain.
🌱 Root Cause (SEO: root cause of overthinking, solutions for overthinking)
Overthinking do jagah se janm leta hai:
1. Anjana future ka darr
2. Purani kahaniyon ka guilt/regret
Jab present moment kamzor ho jaata hai, past aur future milkar dimaag ko capture kar lete hain.
Wahi se shor shuru hota hai.
💛 Emotional Truth (SEO: emotional healing, sensitivity and overthinking)
Tumhara dimaag tumhara dushman nahi.
Woh bas tumhe bachane ki over-koshish karta hai.
Overthinking weakness nahi—
ye tumhari heightened sensitivity ka sign hai.
Tum feel zyada karte ho, isliye think bhi zyada karte ho.
Tumhara dil naram hai,
bas use samhalna seekhna hota hai.
🧭 Identity Shift (SEO: stop calling yourself an overthinker)
Apne aap se kabhi mat bolo:
“Main overthinker hoon.”
Isse bolo:
“Main observer hoon. Mere thoughts mere mehmaan hain.”
Jis din tum thoughts ko mehmaan ki tarah treat kar doge,
power shift ho jayega.
Shor halka ho jayega.
🔧 10-Minute Overthinking Detox Formula (SEO: overthinking cure, quick mental detox)
1) 3-Minute Breath Reset
Slow inhale–slow exhale. Count 4-4.
Saans body ko signal deti hai: “You’re safe.”
2) 4-Minute Thought Dump
Jo dimag mein chal raha hai— paper ya phone notes mein likh do.
Writing = mental drainage system.
Jo bahar aa jata hai, woh disturb nahi karta.
3) 2-Minute Truth Check
Top 1–2 thoughts ko dekho aur pucho:
“Ye fact hai ya fear?”
“Kya ye aaj ke din ko impact karta hai?”
80% thoughts fear hote hain, facts nahi.
4) 1-Minute Grounding
1 cheez dekho.
1 deep breath lo.
1 line bolo:
“Main yahan hoon. Main safe hoon.”
Bas.
10 minutes.
Shor dissolve.
📝 Reflection Exercise (SEO: journaling for overthinking)
Aaj raat likhna:
Kaun sa thought mujhe sabse zyada disturb karta hai?
Agar main us thought ko ek line mein compress karu, woh kya banega?
Uske peeche ka asli emotion kya hai— fear, guilt, ya expectation?
Mera 10-minute detox mujhe kitna halka feel karwata hai?
Ye chaar lines tumhari clarity ka pehla darwaza kholti hain.
🧩 Summary (SEO: overthinking solution in Hindi)
Overthinking problem nahi—
ye unmanaged energy hai.
10-minute detox tumhe wapas present mein laata hai.
Wahi jagah jahan shor dissolve hota hai
aur clarity birth leti hai.
Tum phir se apne dimaag ke malik ban jaate ho.
🌙 Final Note
Jab dimag shor kare, tum khamosh ho jao—
khamoshi shor ko hara deti hai.
Tumhare andar ek calm ocean hai.
Ye blog bas us ocean ka darwaza thoda sa kholta hai.
Agar aap sirf padhna nahi, apne inner system ko reset karna chahte hain — Antar OS yahin se shuru hota hai.”
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विराट कोहली 52वी सेंचुरी । विराट ने रांची में रचा इतिहास दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ
विराट कोहली 52वी सेंचुरी – दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ रांची में गूंजी बल्लेबाज़ी की दहाड़
भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच रांची में खेले जा रहे मुकाबले ने आज एक और ऐतिहासिक पल देखा।
स्टेडियम की हवा में ऊर्जा थी, भीड़ उम्मीदों से भरी थी, और टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर करोड़ों भारतीय दर्शक उस एक ही क्षण का इंतज़ार कर रहे थे— और वह क्षण आखिरकार आ गया।
आज विराट कोहली ने फिर से अपने 100 रन पूरे कर लिए, और इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में विराट कोहली ने 52वी सेंचुरी दर्ज कर दी। यह केवल एक रन का आंकड़ा नहीं था, बल्कि विपक्षी गेंदबाज़ों के खिलाफ धैर्य, आत्मविश्वास, तकनीक और जज़्बे की मिसाल था।
⭐ मैच का हाल – रांची का मैदान बना गवाह
रांची का JSCA स्टेडियम हमेशा रोमांचक मुकाबलों के लिए जाना जाता है, और आज का दिन भी इससे अलग नहीं था।
दक्षिण अफ्रीका के गेंदबाज़ लगातार लाइन और लेंथ पर गेंदबाज़ी कर रहे थे, लेकिन विराट कोहली अपनी पुराने अंदाज़ में धैर्य के साथ टिके रहे—स्थिर, संयमित और पूरा नियंत्रण लिए हुए।
धीरे-धीरे रन बनाते हुए वे उस जादुई तीन अंकों के आंकड़े तक पहुंचे, और जैसे ही उन्होंने सिंगल लेकर अपना शतक पूरा किया—स्टेडियम तालियों से गूंज उठा। ड्रेसिंग रूम में बैठे खिलाड़ियों ने खड़े होकर applaud किया, दर्शकों में जोश और चेहरे पर गर्व साफ दिख रहा था।
⭐ विराट की सेंचुरी खास क्यों है?
✔ यह उनकी 52वीं अंतरराष्ट्रीय शतकीय पारी है
✔ कठिन पिच पर संयम के साथ खेला गया शतक
✔ दक्षिण अफ्रीका जैसे मजबूत विपक्ष के खिलाफ
✔ टीम को मजबूत स्थिति में लेकर जाने वाला महत्वपूर्ण योगदान
विराट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक मानसिकता हैं — Virat Mindset
जहाँ हार, दबाव और गिरावट भी आपको रोक नहीं पाती।
⭐ सेंचुरी की खूबसूरती – सिर्फ रन नहीं, कहानी है
हर सेंचुरी के पीछे एक कहानी होती है—
पसीने की
मेहनत की
और उस अटूट विश्वास की कि मैं कर सकता हूँ।
आज कोहली की पारी भी उसी कहानी का हिस्सा है।
उनके हर शॉट में आत्मविश्वास था, हर रन में दृढ़ता, और उनके चेहरे पर वही पुराना विराट वाला fire — “कभी हार नहीं मानने वाला।”
⭐ फैंस की प्रतिक्रिया – घरों से लेकर स्टेडियम तक खुशियों की लहर
देशभर के फैंस की खुशी तस्वीरों और वीडियो में साफ दिखाई दे रही थी।
टीवी के सामने बैठकर लोग चीख पड़े, सोशल मीडिया पर पलभर में “#ViratKohli100” ट्रेंड करने लगा।
यह सिर्फ एक क्रिकेटिंग मोमेंट नहीं था—यह एक भावनात्मक जुड़ाव था, जिसे भारत में हर उम्र का व्यक्ति महसूस करता है।
⭐ निष्कर्ष
विराट कोहली 52वी सेंचुरी यादगार है—
क्योंकि यह सिर्फ एक खिलाड़ी की वापसी नहीं, बल्कि उसके जज़्बे, उसके संघर्ष और उसके dedication की कहानी है।
रांची का यह मैच आने वाले समय में लंबे समय तक याद रखा जाएगा, और आज कोहली ने फिर साबित कर दिया—
“फॉर्म अस्थायी है, लेकिन क्लास हमेशा कायम रहती है।”
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दिल्ली मेट्रो यात्रा, टैंक रोड शॉपिंग और आउटफिट चुनना | Rohit Shabd Blog
दिल्ली मेट्रो का सफ़र, टैंक रोड की शॉपिंग और मेरे आउटफिट चुनने का पूरा अनुभव
दिल्ली में मेट्रो का सफर अपने आप में एक अलग दुनिया है—
भीड़, आवाजें, लोगों की जल्दी, और अपनी ही सोच में खोए हुए चेहरे।
आज मैं द्वारका मोड़ से मेट्रो में बैठा और राजेंद्र प्लेस की तरफ निकल पड़ा।
मेरा प्लान था टैंक रोड जाकर अपने लिए नए कपड़े लेना।
मुझे ब्रांडेड कपड़ों का कोई खास शौक नहीं है।
ब्रांडेड शर्ट जहाँ 1500–2000 रुपये में आती है,
वहीं टैंक रोड पर उससे आधे में काम चल जाता है।
मेरे लिए कपड़े का मुख्य मकसद है—2–3 बार पहनने लायक अच्छे दिखें, बस।
Delhi जैसे शहर में यही practical approach सबसे अच्छा लगता है।
मेट्रो का सफ़र—भीड़, शोर और सिविक सेंस की कमी
द्वारका मोड़ और राजेंद्र प्लेस दोनों जगह एक जैसी लम्बी कतारें।
लोग चढ़ने के लिए धक्का, उतरने के लिए भाग-दौड़,
और बीच में कुछ लोग जो अपनी दुनिया में बेखबर रहते हैं।
सबसे ज़्यादा irritation मुझे तब होता है जब कुछ लोग
मोबाइल पर तेज़ आवाज़ में गाने, फिल्में या reels चलाते हैं।
इतने लोगों के बीच सफर करते हुए भी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता
कि वही आवाज़ दूसरों के लिए तकलीफ है।
क्या कानों में इयरफोन लगाना इतना मुश्किल है?
सच कहूं तो दिल्ली मेट्रो में इस बात का भी चालान होना चाहिए।
सिर्फ़ सीढ़ियां ब्लॉक करने, गलत तरफ खड़े होने या गेट ज़्यादा देर रोकने का ही नहीं—
बल्कि दूसरों को डिस्टर्ब करने का भी।
राजेंद्र प्लेस पहुंचकर आगे का सफर—बैटरी रिक्शा
स्टेशन पर उतरकर मैंने बैटरी रिक्शा पकड़ लिया।
किराया सिर्फ़ 20 रुपये।
दिल्ली की इन छोटी सवारियों का अपना ही charm है—
हलचल भरी सड़कें, दुकानों की आवाज़ें, और एक अलग सा शहर का flavour।
कुछ देर में मैं टैंक रोड की narrow, भीड़-भाड़ वाली लेकिन जीवंत गलियों में था।
यहाँ की दुकानों में variety भी है, quality भी, और bargaining का मज़ा भी।
टैंक रोड की शॉपिंग—कपड़े, ट्रायल और bargaining का असली खेल
टैंक रोड की शॉपिंग तमाशा नहीं—एक खेल है।
यहाँ दाम पूछना एक कला है, मोलभाव दूसरी,
और सही colour–fit चुनना तीसरी।
मैंने दो आउटफिट try किए:
✔ Bottle green kurta + golden motif jacket
✔ Navy blue kurta + textured navy jacket
दोनों ही अच्छे थे, लेकिन दोनों की vibe अलग थी।
⭐ Green Outfit Review
Bottle-green colour मेरे wheatish complexion पर bright और fresh लग रहा था
Golden motifs elegant और festive दिख रहे थे
Jacket की fitting काफी साफ़ थी
Beard और face tone के साथ अच्छा contrast बन रहा था
Drawback:
Bottom black होने की वजह से match थोड़ा weak लग रहा था।
Best match bottle green bottom या dark beige होता।
⭐ Navy Blue Outfit Review
Navy colour मेरे face को balanced दिखा रहा था
Jacket का texture royal + mature look दे रहा था
Collar frame मेरे face shape पर perfect लगा
यह outfit overall ज़्यादा classy लगा
Bas ek issue tha:
Pant का colour mismatched था।
Navy bottom लेने पर यह outfit 10/10 हो जाता।
⭐ Bottom कौन सा लेना चाहिए? Final Decision
✔ Navy outfit → Dark Navy bottom (Best)
✔ Green outfit → Bottle Green bottom (Best)
Maroon bottom किसी भी outfit के साथ match नहीं करेगा।
अगर सिर्फ़ एक bottom लेना हो,
तो navy bottom दोनों में manageable है (blue में perfect, green में 6.5/10)।
थकान और भूख—दिल्ली की शॉपिंग का असली हिस्सा
ट्रायल, चलना, bargaining, भीड़…
फिर वापस मेट्रो, फिर रिक्शा…
इन सबमें सच कहूं तो भूख और प्यास दोनों लग चुकी थीं।
लेकिन जल्दी की वजह से कहीं रुक नहीं पाया।
दिल्ली में शॉपिंग करते हुए यह बहुत common है—
time का अंदाज़ा नहीं रहता, energy धीरे-धीरे drain होती जाती है।
एक छोटा-सा personal moment—पापा के लिए शर्ट लेना
आज शॉपिंग में सबसे अच्छा काम यह हुआ कि
मैंने दो shirts ले लीं —
एक अपने लिए, और एक पापा के लिए।
सर्दियों में पहनने लायक, daily use वाली।
किसी के लिए कुछ खरीदने की खुशी
पूरे दिन की थकान हल्की कर देती है।
यह छोटी-सी खरीदारी भी दिल को अलग ही खुशी देती है।
इस पूरे सफर ने मुझे फिर याद दिलाया…
कि दिल्ली का charm उसकी मेट्रो, ट्रैफिक, भीड़, दुकानों,
और लोगों के बीच ही है।
कभी irritate करता है,
कभी परेशान,
लेकिन आखिर में यही शहर अपनी रफ्तार से हमें
एक नया अनुभव दे देता है।
आज का दिन थकान भरा था, लेकिन अच्छा था।
Outfit finalised, shirts खरीदी,
और एक पूरा दिन यादगार बन गया।
भारत में ट्रैफिक की समस्या कभी खत्म होगी या फिर नहीं|कारण हकीकत और समाधान
भारत में ट्रैफिक की समस्या कभी खत्म होगी? एक सवाल जो पूरे देश को परेशान करता है।
भारत में ट्रैफिक एक ऐसी समस्या बन चुकी है जो सिर्फ़ शहरों की सड़कों पर नहीं, लोगों के दिमाग पर भी बोझ बनकर बैठी है। रोज़ का जाम, बसों में गुसा हुआ सफर, हॉर्न का शोर, सड़क के बीच रुके वाहन—ये सब जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है।
लेकिन असली बात यह है कि हम इस समस्या के साथ जीना तो शुरू कर देते हैं, पर इसके पीछे के कारणों पर सवाल नहीं करते।
ना प्रशासन से पूछते हैं,
ना सिस्टम से,
ना उन लोगों से जो सड़क पर अनावश्यक तरीके से वाहन खड़ा कर देते हैं।
ट्रैफिक सिर्फ़ वाहनों की भीड़ नहीं—यह प्रबंधन की कमी है
जहाँ बैटरी रिक्शा खड़ा है—वह क्यों खड़ा है?
वहाँ पार्किंग क्यों नहीं है?
सड़क इतनी संकरी क्यों है?
वाहन एक लाइन में क्यों नहीं चल पा रहे?
ट्रैफिक पुलिस कंट्रोल क्यों नहीं कर पा रही?
ये वे सवाल हैं जो कोई नहीं पूछता।
दुख की बात यह है कि जब चालान काटने की बात होती है, ट्रैफिक पुलिस अचानक सक्रिय दिखती है। पर जब सड़क पर जाम हटाने की जरूरत होती है, तब वही व्यवस्था गायब हो जाती है।
यह समस्या सिर्फ़ दिल्ली की नहीं—यह पूरे देश की कहानी है।
जनता संघर्ष करती है, सिस्टम जवाब नहीं देता
भारत का आम नागरिक ट्रैफिक, प्रदूषण, गड्ढेदार सड़कों, अव्यवस्थित बिजली तारों और कूड़े के ढेरों के बीच हर दिन जूझ रहा है।
उसे सुविधाएँ कम और परेशानियाँ ज़्यादा मिल रही हैं।
बड़े-बड़े वादों और विज्ञापनों के बीच, वास्तविक ज़िंदगी में जनता को राहत नहीं दिखती।
लोग सुधार की उम्मीद रखते हैं, पर व्यवस्था बदलने की रफ्तार बेहद धीमी है।
ट्रैफिक सिर्फ एक समस्या नहीं—यह हमारे शहरों की योजना, प्रशासनिक क्षमता और नागरिक प्रबंधन का आईना है।
आखिर कब मिलेगा सामान्य जीवन?
सवाल यह नहीं कि ट्रैफिक कब खत्म होगा।
सवाल यह है कि हम
कब एक ऐसी व्यवस्था बनाएँगे जो सड़क को सड़क और जीवन को जीवन बनने दे।
क्योंकि आज का यह संघर्ष—
हर नागरिक को चुपचाप जीने पर मजबूर कर रहा है।
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