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मेट्रो स्टेशन

आपके लिए कौनसा मेट्रो स्टेशन महत्वपूर्ण है? और क्यो ? यह एक बहुत ही अच्छा सवाल है जिससे आपको पता चलता है की आप जब किसी जगह पहली बार जाते है तो आपको कितना अजीब और नया सा लगता है ओर जैसे जैसे आप उस रास्ते पर हर रोज जाने लग जाते है, तो वह रास्ता भी आपका मित्र बन जाता है, पहली बार तो आप किसी से रास्ता पूछते है लेकिन जब आप उसी रास्ते के आदि हो जाते है, तो वही रास्ता आप दूसरों को बताने ओर समझाने लग जाते है, क्युकी अब वो रास्ता आपको याद हो गया है, यही रास्ता आपका हर रोज का सफर हो गया है।

हम सभी हर रोज घर से ऑफिस , दुकान , स्कूल, कोचिंग, घूमने आदि इत्यादि अनेक कार्य के लिए घर से निकलते है, घर के पास वाला मेट्रो स्टेशन और गंतव्य स्थान उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है, क्युकी हर रोज हम वही से अपना सफर तय कर रहे है। हमारे कदम खुद ही उस रास्ते की ओर चलने लग जाते है।

उस रूट से हम बहुत फैमिलियर हो जाते है, यह हमारा रास्ता बन जाता है, पहली बार इस रास्ते पर जाने में हिचकिचाते है, लेकिन जब हर रोज जाने लग जाते है, तो वह रास्ता आदत में आने लग जाता है, उस रास्ते पर मिलने और जाने वाले लोग भी आम लगने लग जाते है, यदि हम किसी अंजान जगह चले जाए तो हमे पहली बार तो अजीब लगता है, लेकिन जब दूसरी बार जाए तो सब ठीक हो जाता है। फिर उसी जगह जाने में कोई दिक्कत ओर परेशानी नहीं आती, फिर घबराहट नहीं होती, फिर उस सफर के लोग अनजान नहीं होते, अब सफर की आदत हो जाती है, उस सफर को अब बहुत उत्सुकता से भी नहीं देखते और बस उस रास्ते पर चलते जाते है।

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दो दोस्त मेट्रो में

अक्सर ये देखा जाता है की कुछ मेट्रो में या कही भी इस तरह से मिलते है जैसे की वो एक लंबे अरसे बाद मिल रहे हो लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है वो मिलते ही रहते है बीच बीच में एस उन दृश्यों से लगता है , लेकिन ये लोग कुछ इस तरह से दर्शाते है जैसे की आज मिले है कभी मिले नहीं थे ओर फिर शायद कभी मिलन नहीं होगा, वो ढेर सारी इनके बीच बाते अधूरी सी पड़ी है जो ये आज पूरी कर लेंगे , जरा देखिए जब दो दोस्त मेट्रो में मिलते है , दो दोस्त मेट्रो में मिलते है ओर फिर बस सन्नटा गहरा अब उनके बीच में कोई संवाद नहीं होता बस जद्दोजहत थी तो साथ बैठने तक की ओर कुछ नहीं

दो दोस्त मेट्रो में मिलते है अबे कहा था, इतनी देर से फोन कर रहा हूँ, फोन नहीं उठा रहा है तू बे

अरे कही नहीं माँ से बात रहा था यार  

वह मित्र अब उसके बगल में बैठ जाता है,  

क्या हाल चाल है तेरे , क्या चल रहा है?

हा ठीक,  आज लेट हो गया है

उत्तर : हा यार

उसके बाद घनघोर सन्नाटा उन दोनों के बीच में बस बाते खत्म हुई यही 2-3 लाइन थी जो आपस में उन्होंने बोली थी, मिले तो ऐसे थे नया जाने कितनी ही बाते अधूरी थी, जो उन दोनों दोस्तों को करनी पूरी थी अब बीच में या गई फोन की दीवार ओर लग गए अपने अपने फोन में।

आजकल लोग एक साथ बैठना तो चाहते है, लेकिन उनके पास बात करने को कुछ नहीं होती बस बैठना चाहते है, जो बैठा हो वह पर उसको सरकाना जो बेचारा आराम से बैठा है, उससे सीट साफ करवा देते है आप घर में कुछ बात नहीं करते है, आपस में लेकिन बैठना बगल में ही है, घर में आप शक्ल भी नहीं देखते है फोन की शक्ल में व्यस्त होते है, लेकिन साथ बैठना है बहुत ही समझ से बाहर है, यह बात मेरे तो दूसरे को इधर उधर सरका कर खुद बैठ जाना, पता नहीं कहा की अकलमंदी है यह………….

क्या वो गुम हो जाएगा यदि आपके साथ नहीं बैठा तो, छोटा बच्चा है क्या आपका मित्र, भी, या जो भी साथ है।

क्या उसके साथ बहुत सारी बाते अभी करोगे? यदि वो साथ नहीं बैठा तो क्या दिक्कत हो रही है, यह बात समझ नहीं आती।  

की आप 3 लोग मेट्रो में चढ़ते है ओर आपको एक साथ सीट नहीं मिलती तो आप दूसरे लोगों को adjust करवाने लग जाते हो, की हम आए है हम इधर एक साथ बैठेंगे आप हमारी वजह से इधर उधर हो जाओ।

क्या आप उधर बैठ सकते? क्या आप उधर चले जाएंगे? बस यही रहता है, पता नहीं कितना प्रेम उस टाइम इनका झलकता है, लेकिन वो लोग कुछ बात नहीं करते बस अपने अपने मोबाईल में लग जाते है।  

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